बालाकृष्णन पर साधे तीर पूर्व न्यायमूर्ति जेएस.वर्मा

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देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जेएस.वर्मा ने विवादों में घिरे पूर्व समकक्ष केजी बालाकृष्णन पर फिर निशाना साधा है। बालाकृष्णन के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष पद पर बन रहने पर सवाल उठाते हुए वर्मा ने कहा, उनके पूर्ववर्ती न्यायमूर्ति वाई के सब्बरवाल की इस पद पर नियुक्ति इसलिए नहीं की गई थी क्योंकि उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप थे।

इतना ही नहीं वर्मा ने सुझाव दिया कि न्यायिक आचार और जवाबदेही विधेयक 2010 में ऐसे विधिक प्रावधान किए जाने चाहिए, जिससे न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद अपने पूर्व पद की गरिमा को चोट न पहुंचा सकें। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने शनिवार को बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा न्यायिक आचार और जवाबदेही विधेयक 2010 विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कहा, उलटफेर देखिए, सब्बरवाल को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद के लिए फिट नहीं माना गया।

अब इस पद पर बालाकृष्णन बैठे हुए हैं। सब्बरवाल पर लगे आरोप भी करीब उसी प्रकृति के थे, जैसे बालाकृष्णन पर हैं। दोनों पर एक तरह के आरोप थे कि दोनों के संबंधियों और परिजनों ने उनके मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल के दौरान आय से अधिक संपत्ति अर्जित की।

ऐसे मामलों में कानून कहता है, यदि रिकार्ड पर सामग्री संदेह उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है तो उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं हो सकती। वर्मा ने कहा, पूर्व प्रधान न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने पूरे संस्थान को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।

जब तक आरोप झेल रहे कुछ लोगों आरोपों से मुक्त नहीं होते अथवा दंडित या दोषी करार नहीं दिए जाते पूरे न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह बरकरार रहेगा। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रख्यात कानूनविद् फॉली एस नारीमन ने कहा कि न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद अभियोजन में किसी भी प्रकार का कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

इसके लिए न्यायाधीशों की सेवानिवृत्त आचार संहिता में नए विधिक प्रावधान किए जाने चाहिए, जिससे न्यायाधीश संरक्षण कानून 1985 निष्प्रभावी हो सके।

Posted on Mar 6th, 2011
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Posted in :  ब्रेकिंग न्यूज     
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