सावधानी

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सावधानी हटी दुर्घटना घटी
बच्चोका नशा
आजकल सभी लोगो के मुँह से सुनने को मिलाता है कि नई जनरेशन.. नई जनरेशन, नई जनरेशन ऐसी है, नई जनरेशन वैसी है, नई जनरेशन कितनी आगे है, नई जनरेशन मे तो संस्कार ही नहीं है, नई जनरेशन असभ्य होती जा रही है…
बस..बस… रुको…!
सब ना जाने क्या क्या कहते है…?
परन्तु क्या कभी हमने सोचा है कि इतना बदलाव कहाँ से आ रहा है हमारे अपने बच्चो मे…?
सबसे पहले तो हमको यह समझ लेना होगा कि नई जनरेशन कोई आसमान से नहीं आ रही है.
वह हमारे अपने बच्चे है जो नई पीढ़ियों के रूप मे समाने आते है उन्हें हम नई जनरेशन कहते है.
इतना परिवर्तन कैसे…?
साहब जी बच्चे तो वही है प्रथा भी वही है, सूर्य-चंद्र भी अपनी जगह सही है, ऋतुएँ भी सही समय से आ रही है और सही समय से जा रही है. परन्तु अगर बदलाव हो गया तो तकनीकि चीजों का और हमारी सोच का…
आज हमारे घर मे ऐसे-ऐसे उपकरण मौजूद है कि किसी को भी नई जनरेशन का बना सकते है. यह तो बच्चे है…!
हमारी जिंदगी मे पहले सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान था, आज रोटी, कपड़ा, मकान, के साथ मकान मे टी.वी. और हर सदस्य के पास मोबाइल न हो तो घर मे शांति रह ही नहीं सकती.
मोबाईल, टी.वी. हो गयी तो लेपटोप या कंप्यूटर भी आवश्यक है. नहीं तो समाज मे हम बैकवर्ड (पिछड़ा) कहे जाएगे. बस यही दर्द हमको नई जनरेशन को पैदा करने का मौका देता है. आज हम पूरी तरह से अपने पडोसी या अन्य किसी परिचित की नक़ल पर जीते है. वही हमारे बच्चे भी सीखते है. आज अगर हम अपना सारा काम दूसरों की देखा-देखी मे करेंगे तो हमारे बच्चे उसी का अनुसरण करेंगे और वह भी किसी दूसरे की देखा-देखी करेंगे.
अगर शर्माजी का लड़का/लडकी इंग्लिश मीडियम मे पढने जाते है, तो हमारे लडके/लडकी भी जायेंगे, शर्माजी का लड़के/लडकी के पास मोबाइल, मोटरसायकल है तो हम भी परेशान है कि अपने बच्चो को कब दिला दूँ ताकि हमारे बच्चे अपने अंदर हीन भावना न पालें.
यदि हमको लगता है कि अगर ये सब चीजे हमारे बच्चे के पास नहीं होगी तो उसकी पढाई पर असर पड़ेगा तो हम गलत सोचते है…!
बच्चो को पढाई के लिये अगर आप आधुनिक तकनीकि से सजा रहे हे तो आप सही कम और गलत अधिक कर रहे है. क्योंकि अगर हम अपने बच्चो को सही रखना चाहते है और कुछ बनाना चाहते है तो उनको आधुनिक चीजों की नहीं बल्कि अच्छी गाईड लाईन की जरुरत है. हमको अच्छा अभिभावक बनकर उनको सही मार्गदर्शन देना है और दोस्त बनकर अपने बच्चो की बातों एवं समस्याओ का हल देना है.
परन्तु हम चलते है इसके ठीक उल्टा, साल मे जब बच्चो का रिजल्ट आता है तो हम उनके बारे मे सोचने लगते है अब क्या करवाना है. फिर एडमिशन के बाद भूल जाते है की बच्चा क्या कर रहा है.
क्या आपको पता है कि आपके बच्चे का रिजल्ट इतना कम क्यों आया..? या इतना ज्यादा क्यों आया…?
अगर रिजल्ट ज्यादा आता है तो हम सामने से उसका श्रेय ले लेते है. अगर रिजल्ट कम आता है तो वह बच्चे पर डाल देते है और साथ मे यह भी कहते है कि मैंने क्या क्या नहीं किया मोबाइल दिया, गाड़ी दी, कंप्यूटर दिया, महंगे कपडे दिलाये, तेरी हर बात मानी, फिर भी तेरा यह हाल…? मै सोच भी नहीं सकता था कि मेरा बच्चा ऐसा निकलेगा…
रुक जाओ… रुक जाओ…
अब बस करो अपने बच्चो को कोसना. कमी आपकी है, जो आपने सुविधाए तो दी पर उसका सही इस्तेमाल नहीं बताया.
क्या कभी आपने देखा कि आपके बच्चे को कुछ अलग प्रकार की बिमारी लग गयी है.
जो आपने उसको मोबाईल दिया है अपनी सुविधा के लिए, वह तो उसका इस्तेमाल अपने लफंगे दोस्तों के साथ S.M.S. बाजी मे कर रहा है.
और कम्प्युटर मे आपने जो इन्टरनेट दिया है, वह उसका उपयोग जानकारी प्राप्त करने से ज्यादा वह फेसबुक, ट्विटर से कनेक्ट हो कर चेटिंग कर रहा है.
जो आपने गाड़ी दी थी कि बच्चे समय से घर आये और समय से जाए, उसका इस्तेमाल तो वह अपने दोस्तों के साथ घुमने और उनको घुमाने मे कर रहा है. उसको जब भी समय मिलाता है वह अपने बोयफ्रेंड/ गर्लफ्रेंड के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाता है.
अब आप सोचिए कि बच्चो को सुविधा कि जरुरत है या सही मार्गदर्शन की…?
हमें खुद अपने बच्चो का आदर्श बनना पड़ेगा ताकि बच्चे हमारा अनुसरण करे जिससे उनके अंदर हमारे संस्कार हमारी एवं संस्कृति बनी रहे.
परन्तु जब हम खुद ही स्टारप्लस और जीटीवी के सीरियलों की नक़ल करते है तो बच्चे हमारी बोलीवुड फिल्मो की नक़ल तो करेंगे ही. क्योकि बच्चे तो उस कोमल पौधे की तरह से होते है जिनकी देखरेख सही ढंग से न की जाय तो वह झाड का रूप ले लेगे…?
अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि बच्चे को पौधा बनाना है या झाड. बच्चे-बच्चे ही है नई जनरेशन का नाम देने वालो को सोचना पड़ेगा कि हमारी नई जनरेशन कैसी होनी चाहिए, सभ्य या असभ्य..?
बच्चो पर ध्यान देने योग्य बाते
१. अगर हमारा बच्चा स्कूल/कॉलेज मे जाता है तो हमको उसकी उपस्थिति के बारे मे पता होना चाहिए कि वह कितने दिन स्कूल/कॉलेज मे पहुंचा.
२. बच्चे के मोबाइल और कंप्यूटर को सदैव चेक करते रहे और उनके सभी मोबाइल दोस्तों कि जानकारी रखे.
३. बच्चो को इन्टरनेट पर बैठने की आजादी न दे, अगर वह इन्टरनेट पर बैठा है तो आप उसपे ध्यान दे कि कही वह किसी गलत साईट पर तो सर्च नहीं कर रहा है.
४. बच्चो को सदैव कैरियर के साथ-साथ करेक्टर भी बनाने कि सलाह देते रहे. ऐसा न हो कि हमारे बच्चे किसी रेव पार्टी या होटलों से पकडे जाए पुलिस के फोन आने पर हमें खबर मिले कि हमारे बच्चे मौज मस्ती कर रहे थे.
५. बच्चो को इतनी सुविधा भी न दे कि वह विलासिता पूर्ण जिंदगी व्यतीत करे और किसी बुरी संगत मे पड़ जाए.
६. सदैव बच्चो के अभिभावक एवं दोस्त बने, मालिक नहीं.

Posted on Sep 27th, 2010
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Posted in :  घर - परिवार     
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