जोश और उमंग के साथ होली को तैयार पूरा देश

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तनमन को मस्ती और उमंग से भर देने वाले होली के रंगीले त्यौहार का पूरे मन से मजा लेने के लिए देशवासी एक बार फिर तैयार हैं। बसंत के ठंडे मीठे मौसम में आने वाले इस बासंती त्यौहार के लिए जैसे प्रकृति ने भी खुद को सजा लिया है। पेड़ों की डालिया नई नवेली हरी सुनहरी पत्तियों के साथ इठलाने लगी हैं और चारों तरफ इतराते लाल गुलाबी फूल जैसे होली का स्वागत कर रहे हैं।

पूरे देश में जोश और उमंग से मनाए जाने वाले होली के त्यौहार के लिए देश के हर राज्य के लोगों ने परंपरागत ढंग से तैयारी की है। उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में जहा रास मंडलियों ने होली की विशेष तैयारिया की हैं, वहीं विभिन्न समूह और संगठन भी पूरी तरह होली के रंग से रंगे हैं। ब्रज में 20 मार्च से काफी पहले ही होली का रंग शुरू हो गया था जहा की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

मथुरा-वृंदावन रास मंडली के संचालक कन्हैया लाल का कहना है कि ब्रज क्षेत्र की होली का सबसे बड़ा आकर्षण बरसाने की लट्ठमार होली है जिसे देखने काफी तादाद में विदेशी भी आते हैं।

लट्ठमार होली में ब्रज की महिलाएं खुद को राधा की सखिया मानती हैं और उन्हें छेड़ने वाले कृष्ण के सखा रूपी पुरुषों को लट्ठ से मारती हैं। मथुरा, वृंदावन, नंदगाव, दाऊजी आदि स्थानों के मंदिरों में फूलों और गुलाल से होली मनाने की विशेष तैयारिया हैं।

‘दूध दही का खाणा’ वाला हरियाणा भी लट्ठमार होली खेलने के लिए तैयार है जहा की ‘वीरवाणी’ पुरुषों पर डंडों के ताबड़तोड़ वार करती हैं। मध्यप्रदेश भी पूरी तरह होली के रंग में रंगा है। राज्य में होली के पाच दिन बाद रंगपंचमी के लिए भी खासी तैयारिया की गई हैं जहा होल्कर राजाओं के जमाने से इंदौर, ग्वालियर और आसपास के इलाकों में रंगपंचमी पर ‘गेर’ यानी फाग यात्रा निकालने की परंपरा है।

पश्चिम बंगाल भी रंगों के पर्व से लबरेज जहा होली ‘डोल जात्रा’ या ‘डोल पूर्णिमा’ कहलाती है। राज्य में इस अवसर के लिए राधा कृष्ण की प्रतिमाएं सजाई गई हैं।

कन्हैया लाल के अनुसार पश्चिम बंगाल में होली मनाने का ढंग थोड़ा अलग है। इस दिन परिवार का मुखिया उपवास करता है। घरों में भगवान कृष्ण और अग्निदेव की पूजा की जाती है और उन्हें भोग लगाने के बाद होली की शुरुआत होती है।

गुजरात में भी होली का रंग निराला है। सूरत के लोक कलाकार रेवती सिंह का कहना है कि इस बार ‘होली महाराज’ चुनने के लिए कई स्पर्धाएं आयोजित की गई हैं।

इस परंपरा के तहत युवा पिरामिड बनाते हैं और पिरामिड तोड़ने के लिए छतों से महिलाएं रंगीन पानी फेंकती हैं। फिसलन के बीच संतुलन बनाता हुआ युवक शिखर पर पहुंच कर रंग भरी मटकी तोड़ता है और ‘होली महाराज’ चुना जाता है।

राजस्थान की बात की जाए तो बालू के ढेर का शहर कहे जाने वाले बीकानेर में होली मनाने का एक अलग अंदाज है। यहा का हर वाशिन्दा होली पर यहा आने के लिए लालायित रहता है। यहा फाल्गुन मास की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक चंग पर पड़ती रसीले रसियों के गीतों की थाप, देवर-भावी की नोंक-झोंक से ओतप्रोत गीतों के बोल, डाडिया नृत्य के आयोजन, डोलची और रम्मते देशी विदेशी लोगों को अपने रंग में डुबोए रखते हैं।

रियासत काल से चल रहीं इन परंपराओं और गंगा जमुनी तहजीब कहे जाने वाले रेतीले धोरों के शहर बीकानेर में पुरूष और महिलाएं बढ़-चढ़कर होली के त्योहार में रच बस जाते हैं।

पंजाब में होली को ‘होला मोहल्ला’ कहा जाता है। इस दिन भागड़ा, गिद्दा, मार्शल आर्ट, कुश्ती आदि के आयोजन इसे अत्यंत खूबसूरत बना देते हैं।

दक्षिण भारत में होली की धूम उत्तर भारत की तुलना में कम होती है। आध्रप्रदेश में लोग पूजा करते हैं तथा बड़ों के पैरों पर गुलाल और अबीर लगा कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। राज्य में बंजारा समुदाय को लोग रंग बिरंगे परिधान पहन कर नृत्य करते हैं और होली खेलते हैं।

बिहार में होली के दिन पूजा के बाद अबीर गुलाल लगाया जाता है और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।

कुछ ऐसी भी जगह हैं जहा किसी विश्वास या अंधविश्वास के चलते होली नहीं मनाई जाती। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के खरहरी गाव में पिछले 150 साल से होली नहीं मनाई गई है।

Posted on Mar 19th, 2011
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Posted in :  हिंदुस्तान     
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