गरीबों की संख्या कम आंक रहा योजना आयोग

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गरीबों की संख्या के आकलन और गरीबी उन्मूलन संबंधी योजनाओं को लेकर योजना आयोग की काबिलियत पर सवाल उठने लगे हैं। इस मामले में आयोग के कामकाज की खिंचाई करते हुए संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की राय है कि योजना आयोग को सिर्फ गरीबी के आकलन का पैमाना तय करने तक ही सीमित रहना चाहिए, गरीबों की संख्या का अनुमान लगाने जैसे काम किसी योग्य एजेंसी पर छोड़ देने चाहिए।

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने गरीबी उन्मूलन योजनाओं की खामियों की तरफ इशारा करते हुए उन्हें दूर करने के उपायों पर जोर दिया है। समिति का मानना है कि पिछले कई वर्षो में सरकारी तंत्र में बने छिद्र इन योजनाओं को लक्ष्य तक पहुंचने से रोक रहे हैं। गरीबों की संख्या के आकलन के तरीकों में भी समिति ने कमियां पाई हैं। यही वजह है कि गरीबों की संख्या को लेकर सरकार के आंकड़ों में भिन्नता दिखायी देती है। अब तक गरीबों की संख्या को लेकर चार अलग-अलग आंकड़े आ चुके हैं।

गरीबों की संख्या में वृद्धि को लेकर राज्य सरकारों को एक निश्चित सीमा से आगे नहीं जाने के योजना आयोग के निर्देश को लेकर भी समिति अचंभित है। समिति ने हैरानी जताते हुए कहा है कि योजना आयोग गरीबों की संख्या के आकलन के समय अधिकतम वृद्धि की सीमा कैसे निर्धारित कर सकता है? आयोग ने राज्यों को वर्ष 2000 के सर्वे से दस प्रतिशत की सीमा से आगे की वृद्धि को लेकर पाबंदी लगाई हुई है। समिति का कहना है कि इस तरह के निर्देशों से सही नतीजे प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं।

इसलिए समिति की यही राय है कि योजना आयोग को गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले वाले लोगों की पहचान का पैमाना तय करने के काम तक ही सीमित रहना चाहिए। उनकी संख्या के आकलन का काम किसी प्रशिक्षित एजेंसी पर छोड़ देना बेहतर है। इसके लिए समिति ने सभी संबंद्ध विभागों और मंत्रालयों के साथ मिलाकर एक संयुक्त तंत्र स्थापित करने की सलाह दी है जो गरीबों की संख्या के आकलन से संबंधित सर्वे का काम करे। इसमें राज्य सरकारों के विभागों को शामिल करने की सलाह भी समिति ने दी है।

Posted on Mar 19th, 2011
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Posted in :  सरकारी-तंत्र     
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