अदरक है गुणों की खान

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रसोई के मसालों में अनेक ऐसी चीजें हैं, जो कई रोगों के इलाज में सफलतापूर्वक सदियों से प्रयोग की जाती रही है। इन्हीं में शामिल है अदरक। आयुर्वेद में इसे कई तरह की तकलीफों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पुराने समय में ग्रीक में लोग खाने के बाद ब्रेड में लपेट कर अदरक खाते थे। चीन के नाविक नाव चलाते वक्त जी मिचलाने पर अदरक चूसते थे।

वास्तव में अदरक गुणों की खान है। वह सिर दर्द भगाता है, पेट की गडबडी कम कर देता है, पाचन-क्रिया को दुरुस्त करता है, खांसी में आराम पहुंचाता है। स्त्रियों की बहुत सी तकलीफों में भी आराम देता है। यहां तक कि कैंसर के इलाज में भी मददगार है। इसे सुखा कर सोंठ बनाया जाता है।

इसका पाउडर अनेक तकलीफों, जैसे मेंसेज की गडबडी, डिलीवरी के बाद की दिक्कतों और जोडों व कमर दर्द में फायदेमंद होता है। अनेक न्यूरोलॉजिकल समस्याओं में भी अदरक आराम पहुंचाता है। आंकडे बताते हैं कि अदरक गैस्टिक अलसर, जुकाम, गठिया, संधिवात, सेक्सुएल डेफिशिएंसी, हाई कोलेस्ट्रॉल, एलर्जी, हार्ट प्रॉब्लम्स में काम करता है। इसके अनगिनत फायदों को देखते हुए इस पर अभी भी लगातार अध्ययन जारी हैं। उम्मीद है कि इसे जल्दी ही भारतीय रसोई से निकालकर चिकित्सकीय दवाओं में शामिल कर लिया जाएगा।

न्यूमोकोक्कल संक्रमण से बचें

क्या आप जानते हैं कि न्यूमोकोक्कल जीवाणु हर साल पूरे विश्व में 16 लाख लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनके द्वारा उत्पन्न प्रमुख रोगों में न्यूमोनिया (फेफडों का रोग), बैक्ट्रीमिया (रक्त रोग) एवं तानिका शोध (मस्तिष्क रोग) शामिल है। सही निदान के बावजूद सर्वश्रेष्ठ सेंटर्स के डॉक्टरों के लिए इस बीमारी का इलाज करना कठिन हो जाता है। इसके लिए प्रयोग की गई पेंसिलीन, कोट्रीमोक्साजॉल और एरिथ्रोमाइसिन जैसी अनेक दवाओं की प्रतिरोधकता के बारे में रिपोर्ट मिली है। आधुनिक दवाओं की अनेक प्रगतियों के बावजूद हर साल हजारों लोग इस बीमारी के कारण मर जाते हैं। यह रोग किसी को भी हो सकता है, पर ऐसे लोगों को इसका खतरा अधिक होता है -

1. यदि व्यक्ति अधेड है।

2. अगर वह चिरकालिक बीमारी जैसे फेफडों, हृदय, यकृत, वृक्कीय रोग से पीडित है।

3. अगर वह डायबिटीज से पीडित है।

4. अगर कैंसर, ल्यूकेमिया, एचआईवी संक्रमण के कारण उसका प्रतिरोधकता तंत्र कमजोर है। इसे टीका लगाकर रोका जा सकता है। न्यूमोकोक्कल वैक्सीन ऐसे में लाभकारी होता है।

ध्यान दें बच्चों के कामों पर

आज की तारीख में शायद ही कोई ऐसा बच्चा या टीन एजर हो, जो टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर एडिक्ट ना हो। यदि आपके घर में भी ऐसा कोई शौकीन है तो तुरंत ध्यान दीजिए और एलर्ट हो जाइए क्योंकि रिसर्च बताती है कि :

30 प्रतिशत टीन एजर्स इन शौकों के चलते केवल चार से छह घंटे ही सो पाते हैं। केवल दस प्रतिशत ही नींद पूरी करने पर बल देते हैं, चालीस प्रतिशत मानते हैं कि उन्हें थकान जल्दी होने लगती है। याद रखें कि रात भर आंखों के सामने रहने वाली इमेजों से न सिर्फ तमाम सेंसेज गडबडा जाते हैं, बल्कि दिमाग भी सुस्त गति से काम करने लगता है। नींद पूरी ना होने पर पढाई भी प्रभावित होती है और बच्चे को फैट व शुगरयुक्त भोजन अच्छा लगता है। इन सबसे बचना है तो बच्चे के कमरे से टीवी या कंप्यूटर हटा दें और उसकी नींद पूरी करने में सहयोग दें।

सेलफोन नींद ना उडा दे

जैसे-जैसे मोबाइल हमारी जिंदगी का अटूट हिस्सा बनता जा रहा है, वैसे-वैसे उसे लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढती जा रही हैं। इस पर आए दिन नित नई रिसर्च भी हो रही हैं। पिछले दिनों स्वीडन में हुई शोध का परिणाम था कि सोने के पहले मोबाइल फोन के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पडता है। हैंडसेट से निकलने वाले रेडिएशन के कारण व्यक्ति अनिद्रा व व सिरदर्द की शिकायत से तो त्रस्त रहता ही है, उसे मीठी नींद से भी वंचित रहना पडता है। इससे उसकी एकाग्रता में कमी आती है व डिप्रेशन का मरीज भी हो सकता हे। इस सबका उसके व्यक्तित्व पर भी दुष्प्रभाव पडता है। व्यक्ति स्वस्थ रहे इसके लिए गहरी नींद बहुत जरूरी है क्योंकि इसी दौरान दिन भर में क्षतिग्रस्त हुई कोशिकाओं की मरम्मत भी होती है व कोशिकाएं पुनर्जीवित भी होती हैं। मोबाइल नींद में बाधा पहुंचाकर इन सारे रास्तों को बंद कर देता है। जो युवा देर रात तक मोबाइल पर बात करते हैं, उनके लिए यह खबर खतरे की घंटी है।

आंखें हैं तो जहान है

फैशनपरस्ती की होड में आज का युवावर्ग आंख मीच कर भाग रहा है। बिना यह जाने, कि इस का परिणाम क्या होगा। इसी क्रम में बहुत से युवा प्राकृतिक रंगों के स्थान पर अपनी आंखों को नीला या हरा लुक देने के लिए कांटेक्ट लेंस का नियमित इस्तेमाल करते हैं। नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कांटेक्ट लेंस का प्रयोग ठीक से ना किया जाए तो गंभीर नुकसान हो सकता है। इसके अनावश्यक प्रयोग से आंखों में एलर्जी भी हो सकती है। युवा इसका प्रयोग तो करते हैं लेकिन इसके रख-रखाव से अंजान रहते हैं। लेंस गंदा रहने पर उनमें आंखों के आंसुओं में पाए जाने वाले रसायन कैल्शियम, सोडियम आदि एकत्रित हो जाते हैं, जिससे आंखों में एलर्जी होती है। लेंस की नियमित सफाई बहुत जरूरी होती है, क्योंकि वहीं से संक्रमण की शुरुआत होती है। लेंस लगाने से पहले साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएं। लेंस लगाने व उतारने के बाद उसे सॉल्यूशन से धोएं। आपकी सेहत और सुरक्षा दोनों ही आपके हाथ में हैं, किसी दूसरे के नहीं।

Posted on Mar 19th, 2011
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Posted in :  हेल्थ और लाइफस्टाइल     
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