आधी जमीं हमारी, आधा आसमां हमारा

Font Size : अ- | अ+ comment-imageComment print-imagePrint

त्रिआयामी है हमारे लिए मार्च का महीना। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, सखी का सातवां वार्षिकांक है और साथ में फाल्गुन की नेह मस्ती भी इस गुलाबी मौसम में अपने इंद्रधनुषी रंग बिखेर रही है। आशाओं के दीप सजाए समूची आधी आबादी नित नई ऊंचाइयों को छू रही है। बडी-सी दुनिया में अपनी जगह बनाने को निरंतर चल रही है। पतझड और बसंत की जुगलबंदी के बीच जब दरख्तों ने अपने पुराने लिबास झाड दिए हैं और नए ताजा हरे पत्तों के आवरण में खुद को लपेट लिया है, स्त्रियों ने भी अपने भीतर नए आत्मविश्वास, चिंतन और विचारशीलता को आत्मसात करने का संकल्प ले लिया है। बसंत के इसी मदमाते-मोहक मौसम में आता है स्त्रियों का अपना त्योहार यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, जिसकी प्रणेता थीं जर्मनी की शिक्षिका और नारीवादी क्लारा जेटकिन। प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका सीमोन दि बोउवार का कथन है, स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, कोई भी इस बात का प्रमाण नहीं दे सकता कि किसी स्त्री के लिए होमर, अरस्तू, माइकल एंजेलो, बिथोवन बनना असंभव है, लेकिन इस बात का प्रमाण दिया जा सकता है कि कोई स्त्री महारानी एलिजाबेथ, दि बोरा या जॉन ऑफ आर्क बन सकती है, क्योंकि ये उदाहरण खुद में प्रमाण हैं। दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा सामाजिक धारणाएं स्त्रियों को जिन कार्यक्षेत्रों के अयोग्य मानती हैं, उनमें ये स्त्रियां पहले ही सफल होकर दिखा चुकी हैं। ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी स्त्री को शेक्सपियर के नाटक लिखने या मोजार्ट के सारे ऑपेरा संगीतबद्ध करने से रोकता हो..।

इतिहास गवाह है

भारत की बात करें तो वैदिक काल में स्त्री पुरुष से कमतर नहीं थी। धर्म और दर्शन के गूढ क्षेत्रों में गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, घोषा, सुलभा जैसे चरित्र बेहद मजबूत स्थिति में रहे हैं। इतिहास में हम झांसी की रानी, रजिया सुल्तान, नूरजहां, मुमताज महल जैसे किरदारों के बारे में पढते हैं। उन्नीसवीं सदी में राजा राममोहन रॉय और उनके ब्रह्म समाज, ईश्वरचंद विद्यासागर, दयानंद सरस्वती और आर्य समाज, पारसी और ईसाई समुदायों के संयुक्तप्रयासों से 1902 में स्त्री मुक्ति की दिशा में सराहनीय कार्य हुए। 1904 में एनी बेसेंट ने एक ग‌र्ल्स कॉलेज की स्थापना की। 1916 में दिल्ली में पहले ग‌र्ल्स मेडिकल कॉलेज और मुंबई में एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय स्थापित हुए। 1927 में पहली बार भारतीय महिला कॉन्फ्रेंस हुई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में राजकुमारी अमृत कौर, दुर्गाभाई देशमुख, विजयलक्ष्मी पंडित, सरोजनी नायडू, मैडम भीकाजी कामा जैसी स्त्रियों के नाम उल्लेखनीय हैं तो आजादी के बाद लौह महिला इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली प्रधानमंत्री बनीं।

होंगे कामयाब एक दिन

21 वीं सदी तो स्त्रियों की है। न सिर्फ विभिन्न रोजगारों में बल्कि राजनीति, विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी उन्होंने अपनी विजय पताका फहराई है। विभिन्न स्त्रोतों से मिले आंकडों को एकत्र करें तो आज के समय में आईटी इंडस्ट्री, बीपीओ, चिकित्सा, प्रशासन, व्यवसाय, सैन्य क्षेत्रों में उनकी दमदार मौजूदगी नजर आने लगी है। आई टी इंडस्ट्री में 1981 में जहां पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 19.7 प्रतिशत स्त्रियां काबिज थीं, वहीं 1991 में यह संख्या 22.7 फीसदी हो गई। नैसकॉम के ताजा आंकडे बताते हैं कि पिछले दो वर्षो में भारत में स्त्रियों के लिए रोजगार में लगभग 18 फीसदी तक बढोतरी हुई है। माना जा रहा है कि वर्ष 2010 तक स्त्री तकनीशियनों की संख्या 50 फीसदी तक बढ जाएगी। सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में पिछले वर्ष के अंत तक लडकियों का अनुपात 76-26 था, लेकिन आगे 2008 के अंत तक यह अनुपात 76-36 तक हो जाएगा, इसकी पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है।

स्त्रियों के पक्ष में हैं संस्थाएं

कंपनियों ने भी स्त्रियों के हित में कार्य स्थितियों को काफी हद तक बदला है। तमाम संस्थान मानने लगे हैं कि स्त्रियां ज्यादा ईमानदार कर्मचारी साबित होती हैं, लिहाजा वे इस बात पर सहमत हैं कि स्त्रियों को घर और दफ्तर के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए हरसंभव सुविधाएं प्रदान की जाएं। मसलन उनके काम के घंटे कम किए जाएं, उनके लिए पार्ट टाइम नौकरियों की व्यवस्था की जाए, छोटे बच्चों की मांओं को सुविधा रहे, इसलिए दफ्तरों में क्रेश बनाए जाएं, उन्हें आने-जाने की सुविधा देने के साथ ही अपने ढंग से कार्य करने की आजादी दी जाए।

हमें फख्र है इन पर

एक स्त्री के विकास में समूचे समाज का विकास निहित है, क्योंकि संस्कारित-शिक्षित स्त्री से न सिर्फ एक घर संवरता है, बल्कि पूरा समाज सुधरता है। अपने वार्षिकांक और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम सलाम करते हैं कुछ ऐसी हस्तियों को, जिन्होंने समूची आधी आबादी को प्रेरणा दी है। ये हैं, भारत की पहली महिला राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल, वर्ष 2007 में साहित्य का नोबल पुरस्कार प्राप्त डोरिस लेसिंग, अमेरिका की प्रथम महिला और वर्ष 2008 के राष्ट्रपति चुनाव की सशक्त दावेदार हिलेरी क्लिंटन, लेखिका और नारीवादी तसलीमा नसरीन, स्त्रियों के हित में कई कानून पारित कराने वाली केंद्रीय महिला और बाल विकास राज्य मंत्री रेणुका चौधरी, नर्मदा से नंदी गांव तक के मुद्दों पर अनवरत संघर्षरत मेधा पाटेकर, पेप्सिको की सीईओ इंद्रा कृष्णामूर्ति नूई और इस वर्ष पद्मविभूषण से सम्मानित हुई पा‌र्श्वगायिका आशा भोंसले। हम उन तमाम स्त्रियों का भी अभिनंदन करते हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही हैं और नित नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। भारत के बाहर भी स्त्री अधिकारों के लिए संघर्षरत आधी आबादी को हमारा नमन है।

पश्चिमी देशों में भी शोषित है स्त्री

दिल्ली में कुछ समय पहले हुए एक अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन के दौरान अलग-अलग देशों की स्त्रियों के विचारों से रूबरू होने का मौका मिला। ये सभी अपने-अपने स्तर पर संघर्षरत हैं। यहां हमें तसवीर का दूसरा रुख देखने को मिला। आम बातचीत में ऐसा लगता है कि भारत में स्त्रियों की स्थिति दोयम है, लेकिन क्या दुनिया के दूसरे हिस्सों में स्त्री-पुरुष समानता का मुद्दा नहीं खडा होता? क्या भारत के बाहर स्त्रियों की स्थिति बहुत बेहतर है? प्रस्तुत हैं कुछ राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं से हुई बातचीत के अंश।

शोषण के प्रति जागरूक नहीं हैं स्त्रियां

लिंडा वॉल्ड्रॉन (राजनीतिक कार्यकर्ता, ऑस्ट्रेलिया)

हमारे यहां ज्यादा दिक्कत स्त्रियों को एकजुट करने की है। किसी सशक्त आंदोलन की कमी हमें अखरती है। खुद को अभिव्यक्त करने के लिए हमें राजनीतिक मंचों का सहारा लेना पडता है। ऑस्ट्रेलिया में कामकाजी स्त्रियां दोहरे श्रम के बोझ तले पिस रही हैं, दिलचस्प बात यह है कि उन्हें मालूम ही नहीं है कि कुछ गलत हो रहा है। स्त्रियों के हक में बने कानूनों तक की जानकारी उन्हें नहीं होती, उन्हें लगता है कि गरीबी उनके पिछडेपन का बडा कारण है। वे भी पुरुषों को श्रेष्ठ मानती हैं, घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में कम है। गौरतलब है कि स्त्रियां शरणार्थियों की समस्याओं पर बात करती हैं, सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाती हैं, अन्य कई आंदोलनों में शिरकत करती हैं, लेकिन अपने अधिकारों के लिए लडना वे नहीं जानतीं या लडना नहीं चाहतीं।

शैक्षिक-बौद्धिक स्तर उच्च हुआ है

ली यू क्युंग (पत्रकार, दी कोरियन एनजीओ टाइम्स, कोरिया)

भारत और अन्य एशियन देशों में माना जाता है कि हमारे यहां स्त्रियां काफी प्रगति कर रही हैं। कुछ हद तक यह बात ठीक भी है। कोरिया की स्त्रियां बौद्धिक रूप से सुलझी हुई हैं और समय-समय पर अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए लडती हुई भी नजर आती हैं, लेकिन अभी भी कम पढी-लिखी स्त्रियों में यह भावना गहरे तक धंसी हुई है कि स्त्री पुरुष की तुलना में कमतर है। इस धारणा को पुख्ता बनाने के लिए यहां के रोजगार भी बडी भूमिका निभाते हैं, जहां ज्यादातर स्त्री श्रमिकों को पुरुष की तुलना में कम मेहनताना मिलता है। कार्यस्थल में पदोन्नति का मामला हो, रोजगार ढूंढने का मसला हो, स्त्री की स्थिति अपेक्षाकृत निम्नस्तरीय है। कोरियन समाज में नौकरियों में पुरुषों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। हमारे समाज में इधर एक बदलाव देखने को मिला है कि यहां तलाक के मामले तेजी से बढ रहे हैं। इसका एक कारण शायद यह है कि अब स्त्रियां घरेलू हिंसा को सख्ती के साथ न कहने लगी हैं। वे मानने लगी हैं कि एक बदतर जिंदगी से बेहतर है अकेले रहकर अपने सपने पूरे करना या करियर पर ध्यान देना। बडे शहरों में स्त्रियां करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। लेकिन दीगर बात यह है कि शादी के बाद नौकरी करने वाली स्त्रियों की संख्या आधी रह जाती है। कोरिया में अभिभावक बच्चों की शिक्षा को लेकर जागरूक हैं और जितना संभव हो, उन्हें उच्च शिक्षा देना चाहते हैं। यहां शिक्षा और रोजगार में स्त्रियों के साथ भेदभाव की स्थिति है। मेरा मानना है कि जाति, वर्ग, लिंग, नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। हर व्यक्ति जो चाहता है, वह सब कर करने के लिए उसे बराबरी के अवसर मिलने चाहिए।

स्त्री समर्पिता ही है अब तक

तसलीमा अख्तर (कार्यकर्ता, बांग्लादेश)

हमारे यहां स्त्री समर्पिता की भूमिका में है। धर्म का खासा दबाव है उन पर, जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर पुरुष द्वारा स्त्री को शोषिता बनाए रखने के पक्ष में है। लेकिन अब इस गलत धारणा का विरोध लडकियां करने लगी हैं, फिर भी विरोध उतना मुखर नहीं है। हमारे यहां साक्षरता दर अच्छी है, लेकिन उच्च शिक्षा में स्त्रियों की संख्या घट जाती है। भाई-बहन के बीच भेदभाव हमारे समाज में जारी है। मध्यवर्गीय लडकियां पढ भी लेती हैं, लेकिन उनके लिए शादी और घरेलू जिम्मेदारियों को ही प्राथमिक माना जाता है। बांग्लादेश में स्त्रियों की संगठित ताकत का अभाव है। कपडा उद्योग में बीस लाख स्त्रियां हैं, इसके बावजूद उनके साथ भेदभाव बरकरार है। एन.जी.ओ. दावा करते हैं कि वे लडकियों की स्थिति सुधारने के लिए कार्य कर रहे हैं, लेकिन यह सच नहीं है। बांग्लादेश के नारीवादी आंदोलन महज एक वर्ग तक सीमित रह जाते हैं। लेखिका तसलीमा नसरीन जिस तरह स्त्री हक और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लिख रही हैं, वह महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके लेखन पर इतना विवाद होता है कि आम स्त्रियां उसे पढने से ही हिचकिचाने लगती हैं। हम तसलीमा और उनकी किताबों को प्रतिबंधित करने के खिलाफ हैं, क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात है। हम लेखकों, बुद्धिजीवियों से अपेक्षा करते हैं कि वे जो कुछ कह रहे हैं-लिख रहे हैं, उसका प्रभाव समाज पर पड रहा है, इसलिए उन्हें महज स्थितियों का बखान करने के बजाय उन्हें बदलने का माद्दा भी रखना चाहिए।

राष्ट्रपति भवन में पदार्पण प्रतिभा पाटिल का

भारत की बारहवीं राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल इस मायने में उल्लेखनीय हैं कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के शीर्ष राजनैतिक पद पर पहुंचने वाली वह पहली स्त्री हैं। उनके राष्ट्रपति बनने को लेकर उठे तमाम विवादों को विराम लग गया, जब जुलाई 2007 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालकृष्णन ने उन्हें सर्वोच्च पद की शपथ दिलाई। महाराष्ट्र के नादगांव में दिसंबर 1934 में जन्मी प्रतिभा पाटिल की शिक्षा जलगांव से हुई, जो बाद में उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत का भी आधार क्षेत्र बना। शिक्षा क्षेत्र से जुडे देवसिंह रामसिंह शेखावत से जुलाई 1965 में उनका विवाह हुआ। उनके दो बच्चे हैं, एक पुत्र और पुत्री। 1962 में पहली बार प्रतिभा राजनीतिक क्षेत्र में उतरीं। इससे पूर्व वह वकील थीं। वर्ष 2004 में उन्हें राजस्थान की प्रथम स्त्री राज्यपाल होने का गौरव प्राप्त हुआ। उन्होंने महाराष्ट्र के सामाजिक कल्याण, जनस्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण और शिक्षा विभाग में मंत्री पद संभाले। 1986 में राज्यसभा की उपाध्यक्ष बनीं। 1991 में लोकसभा क्षेत्र अमरावती से वह सांसद बनीं। भारतीय संविधान के तहत प्रधानमंत्री के हाथ में कार्यकारी अधिकार ज्यादा होते हैं, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर राष्ट्रपति राज्य, सुप्रीम कोर्ट और सैन्य शक्तियों का मुखिया होता है। इस लिहाज से विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र में पहली बार एक स्त्री का राष्ट्रपति पद तक पहुंचना समूची स्त्री जाति के लिए गौरव की बात है।

साहसी और नोबल लेडी डोरिस लेसिंग

ईरान में 1919 के अक्टूबर महीने में जन्मी ब्रिटिश माता-पिता की संतान डोरिस लेसिंग को वर्ष 2007 में साहित्य के नोबल पुरस्कार से नवाजा गया है। डोरिस के पिता ब्रिटिश सेना में थे जबकि मां एक नर्स थीं। 1925 में ही उनका परिवार जिंबाब्वे आ गया। अब 88 वर्ष की हो चुकीं डोरिस का बचपन बेहद सुखद नहीं रहा है। महज 13 वर्ष की आयु में उनकी स्कूली शिक्षा छूट गई और इसके बाद जीवन की पाठशाला से उन्होंने जो कुछ सीखा, उसी का नतीजा है उन्हें नोबल मिलना। स्कूल छोडने के बाद उन्होंने जीवनयापन के लिए स्टेनोग्राफर, पत्रकार, ऑफिस असिस्टेंट जैसे तमाम कार्य किए। अपने आदर्शो और सिद्धांतों के बलबूते जीने वाली डोरिस के लिए वैवाहिक जीवन सुखदायी नहीं रहा। वह हमेशा अपनी शर्र्तो पर जीना चाहती थीं। उन्होंने दो विवाह किए, दुर्भाग्य से दोनों टूट गए। दूसरा विवाह उन्होंने एक जर्मन व्यक्ति से किया, जो राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय थे। उनके तीन बच्चे हैं। दूसरे विवाह के टूटने के बाद वह अपने बेटे के साथ 30 वर्ष की आयु में ब्रिटेन लौट गई। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी में उन्होंने लंबे समय तक काम किया, लेकिन बाद में कुछ मतभेदों के बाद पार्टी छोड दी। 1950 में उनका पहला उपन्यास दि ग्रास इज सिंगिंग प्रकाशित हुआ। इसके बाद दर्जनों किताबें उन्होंने लिखीं।

सबसे चर्चित हुआ 1962 में लिखा गया उनका उपन्यास दि गोल्डन नोटबुक। यह एक आधुनिक लडकी अन्ना की कहानी है, जो एक पुरुष की ही तरह आजादी से जीना चाहती है। वह एक लेखिका भी है, जो चार अलग-अलग तरह की नोटबुक्स में अपने जीवन के अनुभव लिखती है। काले कवर वाली एक नोटबुक में वह बचपन के अनुभव लिखती है, लाल कवर वाली नोटबुक में राजनीतिक जिंदगी के बारे में, पीले कवर वाली नोटबुक में निजी जिंदगी पर एक उपन्यास और नीली नोटबुक में निजी डायरी लिखती है। नानी-दादी की भूमिका में आ चुकी डोरिस लेसिंग बेहद सक्रिय जीवन जी रही हैं। सोशल नेटवर्किग साइट माई स्पेस में बनाए गए अपने पेज में परिचय कॉलम में उन्होंने लिखा है- आपकी इच्छा और फैसला है कि गलत सोचें या सही, लेकिन जरूरी है कि हर मामले में अपने लिए अवश्य सोचें।

प्रतिभाओं की कमी नहीं

हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं, सिर्फ एक सही दिशा की जरूरत है। ग्लैमर की दुनिया में जहां पद्मश्री माधुरी दीक्षित, रेखा, हेमा मालिनी, डिंपल, शबाना आजमी, सुष्मिता, ऐश्वर्य राय दीपिका पादुकोण, शिल्पा शेट्टी, कोंकणा सेन जैसी प्रतिभाएं हैं, वहीं निर्देशन में रेवती, अपर्णा सेन, फरहा खान, तनुजा चंद्रा, मीरा नायर, दीपा मेहता जैसे नाम प्रतिष्ठित हैं। संगीत क्षेत्र में भारत कोकिला लता मंगेशकर, आशा जी के अलावा अनुष्का शंकर, श्रेया घोषाल, सुनीधि चौहान, मधुश्री तेजी से उभरी हैं तो सानिया मिर्जा एशिया में नंबर वन विंबलडन खिलाडी के रूप में उभरकर सामने आई हैं। बिजनेस में नैना लाल किदवई, किरन मजूमदार शॉ, एकता कपूर जैसे कई नाम लिए जा सकते हैं। लेखन में झुंपा लाहिडी, अरुंधति राय, किरन देसाई, अनीता देसाई की मजबूत लेखनी ने अब तक स्थापित किले ढहा दिए हैं। सुनीता विलियम्स जैसे नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहे हैं। इसके अलावा पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरन बेदी, पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी, एयर मार्शल पी.बंध्योपाध्याय, एवरेस्ट फतह करने वाली बछेंद्री पाल जैसे कई अन्य अनगिनत नामों को भी हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अपना क्रांतिकारी अभिवादन करते हैं।

मजबूत और नेक इरादों वाली रेणुका चौधरी


केंद्रीय महिला और बाल विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रेणुका चौधरी मजबूत इरादों वाली राजनेता हैं। आंध्र प्रदेश के विशाखापतनम में जन्मी रेणुका की परवरिश फौजी माहौल में हुई, क्योंकि उनके पिता सेना में थे। बचपन से ही कहीं कुछ गलत होते देखतीं तो उनके मन में उबाल आता था, जो भविष्य में राजनीतिक क्षेत्र में उनके पदार्पण की नींव बना। स्त्री अधिकारों की प्रबल पक्षधर रेणुका के इस पद पर आने के बाद कई महत्वपूर्ण कानून पारित हुए, जिनमें घरेलू हिंसा निषेध कानून विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसे स्त्रियों की स्थिति सुधारने की दिशा में मील का पत्थर माना जा सकता है। दहेज-विरोधी कानूनों में भी उन्होंने कई संशोधन करवाए। इसके लिए उन्हें कई आलोचनाएं भी झेलनी पडीं। पैतृक संपत्ति में लडकियों को लडकों के बराबर का अधिकार देने के लिए हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन भी किया गया। कार्यस्थल में यौन उत्पीडन और मातृत्व लाभ एक्ट में तमाम संशोधन उनके ही कार्यकाल में किए गए हैं। किसी न किसी कारण रेणुका विवादों में भी घिरती रही हैं। सेक्स एजुकेशन मामले पर उनके विचारों को लेकर भी काफी बखेडा खडा करने की कोशिश की गई। एचआईवी एड्स से बचने के लिए स्त्रियों को दिए गए उनके संदेश पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं हुई। माना गया कि वह समाज में अनैतिकता को बढावा दे रही हैं। फिलहाल एक नए कानून को लेकर काफी शोरगुल है जो इस बात की वकालत करता है कि कई वर्ष तक सहजीवन में रह रहे युगल दंपती को किसी भी विवाहित जोडे की तरह तमाम अधिकार हैं। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के बीच भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं। रेणुका कहती हैं कि स्त्री-पुरुष समानता के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद लिंग के आधार पर भेदभाव कायम है। इसी का नतीजा है स्त्री-पुरुष अनुपात का बढता फासला। सरकार स्त्रियों को शैक्षिक, राजनैतिक, आर्थिक और कानूनी तौर पर सशक्त बनाने के लिए प्रयासरत है।

चक दे इंडिया

वर्ष 2007 में आई फिल्म चक दे इंडिया को इस लिहाज से श्रेष्ठ माना जा सकता है कि यह खेलकूद के क्षेत्र में भी लडकियों की मजबूत भागीदारी का समर्थन करती है। पिछले दिनों दिल्ली के नॉर्थ कैंपस स्थित मिरांडा कॉलेज के वार्षिकोत्सव समारोह में आई इस चर्चित फिल्म की नायिकाएं। स्त्री सशक्तीकरण, लडकियों की सुरक्षा, गैर-बराबरी जैसे तमाम मुद्दों पर उनसे पूछे गए सवालों के जवाब में उनकी राय यहां प्रस्तुत है।

विद्या मालवदे : लडकियों की सुरक्षा को लेकर कई प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं लेकिन मेरा मानना है कि लडकियां तो घर में भी सुरक्षित नहीं हैं, क्या इसलिए हम घर में रहना छोड देंगे? बाहर जाना, काम करना, खेलना, शॉपिंग करना छोड दें, यह सोचकर कि कहीं हमारे साथ छेडखानी न हो, कहीं कुत्सित किस्म के लोग हमें तंग न करें? हम आजाद देश के नागरिक हैं। हमें अपनी रक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।

सागरिका घोष : स्त्रियों को अपनी क्षमताओं को पहचानना होगा, साथ ही मानसिक गुलामी से भी निजात पानी होगी। अपने लिए रास्ते खुद बनाने पडेंगे।

शिल्पा : स्त्री-पुरुष में गैर-बराबरी आज भी है। विवाह के लिए स्त्री की आयु 18 एवं पुरुष की 21 वर्ष निर्धारित है। यदि संविधान के तहत हमें समानता का अधिकार प्रदत्त है तो आयु का ऐसा विभाजन क्यों हो।

चित्रार्शी रावत : आज राजनीति से लेकर खेलों तक स्त्रियां अपनी पहचान बना रही हैं। अब तो राष्ट्रपति पद पर एक स्त्री ही काबिज है। बडी-बडी कंपनियों में स्त्रियां सीईओ हैं। फिर भी यह कहा जा सकता है कि अभी स्त्रियों को अपनी इस लडाई में काफी दूर जाना है। यह तभी होगा जब वे एकजुट होंगी।

औरत के हक में लेखिका तसलीमा नसरीन


पूर्व और पश्चिम में, घर या बाहर, हर जगह प्रताडित है स्त्री। नास्तिक हो या आस्तिक, शिक्षित हो या अनपढ, खूबसूरत हो या बदसूरत, अमीर हो या गरीब, डरपोक हो या साहसी, सादगी से रहने वाली हो या आजादी पसंद, हर स्थान पर वह अत्याचार झेलने को मजबूर की जाती है। -तसलीमा नसरीन

विवादास्पद और स्त्री अधिकारों की जबरदस्त हिमायती लेखिका और कार्यकर्ता डॉक्टर तसलीमा नसरीन का जन्म अगस्त 1962 में पूर्वी पाकिस्तान में हुआ। विभाजन के बाद उनकी जन्मभूमि बांग्लादेश में आ गई। 15 वर्ष की आयु से ही लेखन उनकी रुचि बन चुका था। तसलीमा के मन में विद्रोह के बीज शायद कट्टरपंथी पारिवारिक माहौल में ही पड गए थे। मानवीय मूल्यों में भरोसा रखने वाली तसलीमा पहलेपहल तब चर्चा में आई जब उनकी पुस्तक लज्जा प्रकाशित हुई। इसके पहले वह एक अखबार में नियमित स्तंभ निर्बाचितो कॉलम लिखा करती थीं, जिसके लिए उन्हें 1992 में पश्चिमी बंगाल का प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार आनंद दिया गया। धर्म, राजनीति, स्त्री अधिकारों के लिए खुलकर बोलने वाली तसलीमा ने लगभग 30 पुस्तकें बांग्ला में लिखी हैं। उनमें से कई का अन्य भाषाओं जैसे, हिंदी, मराठी, मलयालम, असमी, उडिया, नेपाली, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, डच, स्पेनिश, स्वीडिश, अरबी में अनुवाद हुआ। लज्जा के अलावा औरत के हक में, द्विखंडित, शोध, फेरा, नोष्टो मेय नोष्टो गोद्यो, आमार मेयबेला जैसी कई पुस्तकें उनकी आई। विडंबना ही है कि तसलीमा का लेखन हमेशा विवादों में फंसता रहा। कट्टरपंथियों को उनकी अभिव्यक्ति का साहसी तरीका रास नहीं आता, लिहाजा कभी उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है तो कभी उनके खिलाफ फतवे जारी कर दिए जाते हैं। अपने लेखन के लिए यूरोपियन संसद की ओर से अभिव्यक्ति की आजादी के लिए उन्हें सखारोव पुरस्कार मिला, फ्रांस सरकार से मानवाधिकार अवार्ड प्राप्त हुआ। ब्रिटेन, स्वीडन, नार्वे, फ्रांस और यू.एस. सरकारों की ओर से भी उन्हें पुरस्कार दिए गए। जर्मनी में उन्हें दाद स्कॉलरशिप मिली तो यूनेस्को से अहिंसा और सद्भावना के प्रचार-प्रसार के लिए अवार्ड मिला। अब 2008 में उन्हें फ्रांस का प्रतिष्ठित सीमोन दि बोउवार नामक पुरस्कार दिया जाएगा। तसलीमा कहती हैं, यदि कोई धर्म अलग-अलग मतावलंबियों में भेदभाव करता है, स्त्री को गुलाम बनाता है या फिर लोगों को अनभिज्ञ करता है तो फिर ऐसे धर्म को मैं नहीं मानना चाहती।

फिलहाल तसलीमा भारत में नजरबंद हैं, वह कोलकाता में रहना चाहती हैं। पिछले दिनों हैदराबाद में उन पर जानलेवा हमला हुआ। उनकी आत्मकथा द्विखंडित को लेकर खासा बवाल मचा। एक स्त्री लेखिका समाज के बने-बनाए ढर्रे के खिलाफ चले, धार्मिक सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ के विरोध में लिखे, यह बात आसानी से लोगों के गले नहीं उतरती। आज तसलीमा के विरोधियों की संख्या भले ही काफी हो, लेकिन उन्हें समर्थन देने वालों की भी कमी नहीं है। ये ऐसे लोग हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यकीन रखते हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी कहती हैं, हम सब लेखक-बुद्धिजीवी तब तक चैन से नहीं बैठ सकते, जब तक तसलीमा नसरीन नजरबंद हैं।

स्थितियां यदि अनुकूल हों..

बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे देखें तो लडकियों के परीक्षाफल लडकों की तुलना में अच्छे रहते हैं, लेकिन उच्च शिक्षा में लडकियों का प्रतिशत अभी बहुत कम है। आज जब हम सफल और शीर्ष पर पहुंचने वाली स्त्रियों की बात करते हैं तो सहज ही सवाल खडा होता है कि ऐसा क्यों है कि केवल 3.3 फीसदी स्त्रियां ही श्रेष्ठता को छू पा रही हैं?

हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक केवल 17.7 प्रतिशत स्त्रियां अपने कार्य में मध्यम स्तर तक पहुंच पाती हैं। सर्वे 1053 स्त्रियों पर किया गया। इनमें से 222 स्त्रियां गांवों, 363 शहरों और 468 स्त्रियां महानगरों की थीं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21वीं सदी में भी 73 फीसदी स्त्रियों का कहना है कि पति एवं परिवार से उन्हें अपने करियर में सहयोग नहीं मिलता, जबकि 42 प्रतिशत का कहना है कि पुरुषों के पास ज्यादा बेहतर विकल्प होते हैं। सर्वेक्षण में एक अच्छी बात यह निकली कि प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद 58.66 फीसदी स्त्रियां करियर को प्राथमिकता देना चाहती हैं, केवल 33.66 प्रतिशत स्त्रियां घरेलू स्थिति में रहना चाहती हैं। बडे शहरों में 17 फीसदी स्त्रियां स्वरोजगार की ओर बढ रही हैं, यानी स्थितियां अनुकूल हों तो वे बहुत कुछ कर सकती हैं।

कहती हैं, योग्य स्त्री से आमतौर पर पुरुष सहकर्मी घबराते हैं, कहीं न कहीं उनके भीतर यह भय रहता है कि स्त्रियां उनसे बेहतर स्थिति तक न पहुंच जाएं। आज भी स्त्री की एक घरेलू छवि ही ज्यादा सराही जाती है।

पेप्सिको की सीईओ इंद्रा कृष्णामूर्ति नूई

विश्व की चौथी सबसे बडी खाद्य और पेय पदार्थ कंपनी पेप्सिको की सीईओ इंद्रा कृष्णामूर्ति नूई का जन्म अक्टूबर 1955 में चेन्नई (तमिलनाडु) में हुआ। 1974 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से रसायन विज्ञान से स्नातक डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने आईआईएम कोलकाता से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया। डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने मदुरा कोट्स सहित कई कंपनियों को अपनी सेवा प्रदान की। प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिग्री उन्होंने येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने मोटोरोला और एबीबी जैसे तमाम समूहों में उच्च पदों पर कार्य किया। उनका विवाह राज किशन नूई से हुआ। उनकी दो बेटियां हैं। 1994 में उन्होंने पेप्सिको में काम करना शुरू किया था और वर्ष 2001 तक अध्यक्ष और मुख्य आर्थिक अधिकारी के बतौर कार्यरत रहीं, साथ ही पेप्सिको के बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स में भी शामिल थीं। 2006 में वह इसके शीर्ष सीईओ पद पर पहुंचीं। पेप्सिको के 41 वर्षो के गौरवशाली इतिहास में वह पांचवीं सीईओ हैं। पेप्सिको का मानना है कि इंद्रा ने एक दशक से भी ज्यादा समय तक कंपनी की रणनीति निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है। अब उनके लिए आगे की राह और भी चुनौतीपूर्ण है। इस पद पर पहुंचने वाली इंद्रा कहती हैं, पेप्सिको में इस पद तक पहुंचना मेरे लिए गर्व की बात है। इसके तमाम बडे-वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही मुझे पूरे विश्व में फैले इसके लगभग डेढ लाख सहयोगियों के साथ काम करने का अवसर प्राप्त हुआ है, जो मुझे रोज नए नतीजे देते हैं और उतने ही समर्पित हैं, जितनी कि मैं। फो‌र्ब्स मैगजीन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में इंद्रा नूई को वर्ष 2007 में विश्व की 100 सबसे ताकतवर स्त्रियों की सूची में पांचवें नंबर पर रखा गया है। जबकि फॉरच्यून मैगजीन ने उन्हें वर्ष 2006-2007 में बिजनेस क्षेत्र में सर्वाधिक ताकतवर स्त्रियों में शुमार किया है।

व्हाइट हाउस की दौड में हिलेरी क्लिंटन

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में पहली बार कोई स्त्री उम्मीदवार है, इसलिए हिलेरी क्लिंटन के चर्चे आजकल आम हैं। 26 अक्टूबर 1947 में शिकागो में जन्मी हिलेरी वर्ष 2000 में पहली बार न्यूयार्क से जूनियर सीनेटर बनीं। वर्ष 2006 में एक बार फिर वह न्यूयार्क से सीनेटर चुनी गई। फिलहाल वह नवंबर 2008 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव की प्रबल दावेदार हैं। हिलेरी ने 1975 में बिल क्लिंटन से विवाह किया। यूनाइटेड स्टेट्स के 42वें राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी ने करियर की शुरुआत वकालत के पेशे से की। एक समय में वह अपने देश के टॉप 100 वकीलों में से एक मानी जाती रहीं। फो‌र्ब्स और टाइम मैगजीन द्वारा विश्व के 100 ताकतवर लोगों की सूची में उनका नाम शामिल किया गया है। हिलेरी बहुत प्रखर वक्ता मानी जाती हैं। खूबसूरत, मुसकराती रहने वाली, किस्सागोई में माहिर हिलेरी कहती हैं- जीवन में आप कुछ भी हों या कुछ भी कर रहे हों, अपने अंतर्मन की बात को सुनना जरूरी है। जीवन की आपाधापी अपनी जगह है लेकिन मैं इसी में से अपने लिए कुछ पल चुराना कभी नहीं भूलती। फिट रहने के लिए नियमित सुबह की सैर, व्यायाम करने के साथ ही विटमिंस का सेवन करती हैं।

मानसिक खुराक के लिए किताबें पढती हैं। समय की जबरदस्त कमी से ग्रस्त हिलेरी कहती हैं कि वह खुद को तब सबसे ज्यादा भाग्यशाली मानेंगी, जब सुबह 7 बजे तक सो सकें। चॉकलेट उनकी कमजोरी है, जिसे वह नहीं छोड पातीं। बेटी चेल्सी को समय देना भी वह कभी नहीं भूलतीं। वह प्रोफेशनल स्त्री रही हैं, इसलिए शुरू से ही उन्होंने अपनी घरेलू जिम्मेदारियों का प्रबंधन बखूबी किया है। बेटी चेल्सी जब छोटी थी तो दोनों पति-पत्नी पार्टियों में जाने से बचते थे। वह बच्चों को ज्यादा चकाचौंध में रखने के विरोध में हैं। कहती हैं बच्चों की परवरिश सामान्य ढंग से होनी चाहिए। उन्होंने बेटी को भी अपने छोटे-छोटे कार्य खुद करने की आदत डाली है, ताकि राष्ट्रपति के परिवार को मिले विशेषाधिकार बच्चों को आम जिंदगी से काट न दें। जनस्वास्थ्य और स्त्री अधिकारों के लिए निरंतर काम करने वाली हिलेरी का स्त्रियों के लिए संदेश है कि उन्हें अपने स्वास्थ्य और व्यक्तित्व दोनों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि कार्य करने की ऊर्जा, उत्साह और जोश उनमें बना रहे, साथ ही कामकाजी स्त्रियों के प्रति समाज का दृष्टिकोण भी संवेदनशील बने।

नशीली आवाज की धनी आशा भोंसल

सितंबर 1933 में महाराष्ट्र में जन्मी आशा भोंसले गायकी की हर विधा में माहिर हैं। गजल, गीत, भजन, पॉप, लोकगीत, कव्वाली, रवींद्र संगीत, नजरूल गीत, सभी में उनकी नशीली आवाज का जादू श्रोताओं के सिर चढकर बोलता है। 1943 में सुरों का सफर शुरू करने वाली आशा ताई को वर्ष 2008 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया है। भारत कोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन आशा जी ने उर्दू, हिंदी, मराठी, तेलुगू, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, तमिल, रूसी, अंग्रेजी, नेपाली और मलयालम जैसी 14 भाषाओं में 12 हजार से भी ज्यादा गीत गाए हैं। शास्त्रीय गायक और थिएटर कलाकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर के घर जन्मीं आशा।

नौ वर्ष की अल्पायु में उन्होंने पिता को खो दिया। इसके बाद उनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और फिर मुंबई आ बसा। पहली बार उन्होंने मराठी फिल्म के लिए गाया। हिंदी फिल्मों में शुरुआत हंसराज बहल की फिल्म चुनरिया के गीत सावन आया से हुई। कम उम्र में ही उन्होंने गणपतराव भोंसले से विवाह किया, जो नहीं चल सका। तीन बच्चों के साथ आशा जी ने बेहद मुश्किल वक्त देखा। शुरू में बी और सी ग्रेड फिल्मों के गीत उन्हें मिले। 1953 में बिमल रॉय ने उन्हें अपनी फिल्म परिणीता में गाने के लिए अनुबंधित किया। राज कपूर की फिल्म बूट पॉलिश के लिए उन्होंने नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है.. गाया। ओ.पी. नैय्यर ने उन्हें बडा ब्रेक दिया फिल्म सीआईडी में। 1957 में बी.आर. चोपडा की फिल्म नया दौर ने उन्हें शोहरत दिलाई। आर.डी.बर्मन की फिल्म तीसरी मंजिल उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई।

इसके बाद आशा जी बर्मन साहब के साथ परिणय सूत्र में बंध गई। फिल्म उमराव जान और इजाजत में उनकी गाई गजलें बेहद कर्णप्रिय हैं, इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड मिला। उन्हें सात बार श्रेष्ठ पा‌र्श्वगायिका का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। रंगीला के लिए उन्हें 1996 में विशेष पुरस्कार मिला, 2001 में फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला। 1997 में आशा जी और उस्ताद अली अकबर खान के संयुक्त एलबम को ग्रैमी अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। इसके लिए नामांकित होने वाली वह पहली भारतीय गायिका बनीं। इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर उन्हें पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया है।

नर्मदा से नंदी गांव तक मेधा पाटेकर

यह नाम है स्त्री के रूप में एक सशक्त आंदोलन का। दिसंबर, 1954 में जन्मी मेधा शायद बनी ही हैं जनसेवा के लिए। बचपन से ही यही लक्ष्य रहा, लिहाजा उन्होंने टाटा इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंसेज से सामाजिक कार्य में एम.ए. की शिक्षा हासिल की। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात के किसान और आदिवासी विद्रोहों में शामिल होने के लिए उन्होंने टाटा इंस्टीटयूट की अपनी फेलोशिप छोड दी। यहीं से शुरुआत हुई नर्मदा बचाओ आंदोलन की। नर्मदा बांध को लेकर उन्होंने 2006 में 20 दिन की भूख हडताल की। उनका मानना था कि नर्मदा बांध सिर्फ गुजरात के समृद्ध जमींदारों के हित में है। ऐसी किसी भी योजना का क्रियान्वयन करते समय बहुत सोचा-समझा जाना चाहिए, जिनमें तीन राज्यों के गरीब किसानों के हित जुडे हों। इसी साल दिसंबर में पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे संघर्ष में शामिल होने के कारण उन्हें सिंगूर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया। कहा जा सकता है कि नंदी ग्राम का मसला सर्वप्रथम मेधा पाटेकर ने ही उठाया था। उनका कहना है कि सेज (स्पेशल इकॉनॉमिक जोन) नीति केवल उद्योगपतियों और समृद्ध लोगों के पक्ष में है। किसानों-गरीबों का इससे कोई हित नहीं होने वाला। इसी मुद्दे को लेकर जब वह नंदी ग्राम जा रही थीं तो नवंबर 2007 में पूर्वी मिदनापुर जिले में उन पर हमला किया गया, जिसमें वह बाल-बाल बचीं। सामाजिक कार्यो के लिए यदि मेधा पाटेकर को बहुत कुछ झेलना पडा तो उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। 1991 में उन्हें राइट लिवलीहुड अवार्ड से सम्मानित किया गया। दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड, महात्मा फुले अवार्ड, गोल्डमेन एनवायरनमेंट पुरस्कार से भी उन्हें नवाजा गया। बी.बी.सी. ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक आंदोलनकारी मानते हुए ग्रीन रिब्बॉन अवार्ड प्रदान किया, एमनेस्टी इंटरनेशनल की ओर से उन्हें मानवाधिकार रक्षक अवार्ड से सम्मानित किया गया।

कुछ उक्तियां, कुछ विचार


मैं स्त्री मुक्ति के पक्ष में हूं, ठीक उसी तरह जिस तरह मैं किसी पुरुष की स्वतंत्रता के पक्ष में हूं। स्त्री-पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर ही एक बेहतर समाज और विश्व का निर्माण कर सकते हैं। इसमें वर्ण, जाति, लिंग और दल का कोई सवाल नहीं खडा होना चाहिए।

-स्वर्गीया प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

देश में कुल आबादी का 48 फीसदी हैं स्त्रियां। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, वकालत, शिक्षण, राजनीति, प्रशासन, पुलिस, बिजनेस, मीडिया, सैन्य सेवा जैसे हर क्षेत्र में वे आगे आ रही हैं। जरूरी है कि वे जागरूक बनें, क्योंकि उनके विचार, कार्यशैली, मूल्य पद्धति बेहतर परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण हैं।

-भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम

मैंने अपनी फिल्मों के जरिए स्त्री के विकास के विभिन्न आयामों को दर्शाया है। मेरे अपने से लेकर मीरा और माचिस तक एक स्त्री की विकासात्मक यात्रा नजर आती है। स्त्री समानता-स्वतंत्रता की बात तभी सार्थक हो सकती है, जबकि उसे स्त्री से पहले एक इंसान के रूप में सम्मान दिया जाए।

-सुप्रसिद्ध गीतकार गुलजार

1. अन्याय का करें विरोध। किसी भी रूप में यदि आपका सम्मान आहत होता है, आपके वजूद को नकारा जाता है तो इसके खिलाफ बोलें। स्वरक्षा के गुर सीखें, साहसी बनें।

2. व्यक्तित्व को संवारें। खुद के प्रति सजग हों, अपने स्वास्थ्य, फिटनेस, खानपान का ध्यान खुद रखें। मन के साथ अपने शरीर को भी सुंदर बनाना सीखें। यदि अपनी दिनचर्या में अब तक योग, व्यायाम या खेलकूद को शामिल नहीं किया है तो अब अवश्य कर लें।

3. परिवार का चयन। आपको अपने परिवार को कितना सीमित रखना है, कितना बढाना है, यह चयन अपने पास सुरक्षित रखें। यथार्थवादी होकर और आज के व्यस्त समय के हिसाब से परिवार नियोजन की महत्ता समझें।

4. यथार्थवादी बनें। स्त्रियों के बारे में अकसर यह कहा जाता है कि वे बहुत भावुक होती हैं। इसलिए अपने जीवन के फैसले करते समय भावनाओं के साथ यथार्थवादी भी बनें ताकि भविष्य में कोई असुरक्षा या मुश्किल स्थिति से बच सकें।

5. शिक्षित बनें। शिक्षा का अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि उच्च शिक्षा हासिल कर लें, बल्कि पढने का क्रम कभी नहीं छूटना चाहिए। रोजमर्रा के जीवन में जरूरी जानकारियां अवश्य हासिल पढने की आदत विकसित करें, कुछ भी नया सीखने को उत्सुक रहें, भले ही अपने बच्चों के साथ ही क्यों न सीखें।

6. जागरूक बनें। अपने लिए थोडा समय अवश्य निकालें। अपना निजी एकांत खोजें और उसमें अपने शौक पूरे करें।

7. लक्ष्य बनाएं। जिंदगी में कुछ भी नहीं है, यदि उसमें कोई जज्बा या जुनून नहीं है। भले ही यह लक्ष्य छोटा हो, लेकिन इसके लिए नियमित कार्य करें।

8. आस्तिक बनें। आस्था का अर्थ धार्मिक होना नहीं है। आस्था किसी भी चीज के प्रति हो सकती है, उससे प्रेम करें, उसके लिए कार्य करें और उसमें निष्ठा रखें। आस्था हमें मुश्किल स्थितियों में जीने का हौसला देती है।

9. व्यस्त रहें। आपको खुद आश्चर्य होगा कि आप इतना खुश कैसे रहने लगी हैं। व्यस्त रहना सीखें। एक अध्ययन बताता है कि उम्र के एक पडाव के बाद ज्यादातर स्त्रियां अपने कार्य में अधिक संतुष्ट होती हैं। कई तनाव या अवसाद सिर्फ खालीपन की भावना से उपजते हैं। जबकि व्यस्त रहने से आत्मविश्वास-संतुष्टि और खुशी का एहसास होता है।
इंदिरा राठौर

Posted on Mar 19th, 2011
SocialTwist Tell-a-Friend
Posted in :  महिला     
Subscribe by Email

Leave a comment

Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)


विदेश

राज्य

महिला

अपराध

ब्यूटी