सिंगूर पर अब अफसोस और खीझ बस

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तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी को यहां से दूसरा राजनीतिक जन्म मिला। माकपा को करारी राजनीतिक शिकस्त। मगर इस शह-मात के खेल में बिसात बने सिंगुर के खाते में बस आया तो अफसोस, खीझ और अब बची है तो एक क्षीण सी आशा। टाटा की ‘नैनो’ गुजरात गई तो सिंगुर की आंखों से उसके विकास के लखटकिया सपने भी जाते रहे।

अब ममता ने रेल कोच फैक्ट्री का सपना सिंगुर की आंखों में बसाया है, लेकिन उसके पूरा होने का यकीन लोगों को कम ही है। अलबत्ता, तीन साल से सिर्फ राजनीतिक कुरुक्षेत्र बने सिंगुर में नैनो जाने का अफसोस होने के बावजूद गुस्सा तृणमूल पर नहीं, बल्कि माकपा पर ही है।

बात विचित्र लगती है, लेकिन सत्य है। पिछले 10 साल से तृणमूल के गढ़ रहे सिंगुर में अब भी दीदी का जलवा है। यहां माकपा के प्रति टाटा को लाने के लिए न तो कोई कृतज्ञता है और न ही फैक्ट्री बंद कराने को लेकर तृणमूल पर कोई नाराजगी। बावजूद इसके कि टाटा की नैनो परियोजना को कुछ और शर्तो के साथ सिंगुर में रोकने के लिए तृणमूल के ही कई स्थानीय नेता पैरवी कर रहे थे। सिंगुर के सहारे राइटर्स बिल्डिंग की सीढि़यां चढ़ने की अपनी महत्वाकांक्षा में समाधान का कोई रास्ता तो ममता को स्वीकार्य ही नहीं था। नतीजतन, किसानों को ज्यादा पैसा, एक सदस्य को निश्चित नौकरी जैसी कुछ शर्तो के साथ टाटा को रोकने की बात करने वाले तारक कर्मकार, प्रदीप डे और कुशल साहा जैसे अपने पुराने कार्यकर्ताओं को ममता ने बाहर का रास्ता दिखाने में जरा देर नहीं लगाई। उस पर तुर्रा यह है कि तृणमूल प्रत्याशी और दो बार से विधायक रबींद्रनाथ भट्टाचार्य के यहां से फिर जीतने में कोई अड़चन नजर नहींआ रही। कारण यह कि सिंगुर के ज्यादातर लोगों को तो माकपा से कुछ लेना भी मंजूर नहीं दिखता। कोलकाता से ग्रेजुएशन कर सिंगुर लौटे प्रदीप्तो दास कहते हैं कि माकपा की दादागीरी से आजिज लोग उन पर तो भरोसा ही नहींकर सकते। अलबत्ता माकपा के जोनल कमेटी सदस्य सुजय बनर्जी जरूर दावा करते हैं कि सिंगुर में विकास बाधित करने की कीमत ममता को चुकानी पड़ेगी।

वैसे तथ्य यह भी है कि शुरू में ममता के सिंगुर के आंदोलन में स्थानीय कम, बाहर से लोग ज्यादा आए। फिर ममता ने पूरे राज्य में ‘मां, माटी और मानुष’ का नारा देकर जमीन अधिग्रहण को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि साम्यवादी सरकार में लोग पूंजीवाद का अक्स देखने लगे। सिंगुर भी इस राजनीतिक आंदोलन में बिना आगा-पीछा सोचे कूद पड़ा, लेकिन अब टाटा के पलायन के बाद सूना नैनो प्लांट उन्हें अखर रहा है।

कारखाना लगने पर जो पूरा इलाका गुलजार हुआ था और जमीनों के दाम जैसे बढ़े थे, सब कुछ मटियामेट हो गया है। सिंगुर में पिछले 15 साल से होटल चला रहे जयदीप बोस बताते हैं कि लोग आने शुरू हुए तो करीब 500 सवारी ढोने वाले मोटर रिक्शा सड़कों पर उतर आए। जगह-जगह खाने-पीने की फेरी वालों के भी पौबारह हो। जमीन की कीमत 20 हजार रुपये कट्ठा से बढ़कर तीन से पांच लाख रुपये कट्ठे तक आ गई। मगर अब सिंगुर में सब कुछ रुक गया है।

अब बस एक उम्मीद है कि ममता बनर्जी सिंगुर में रेल कोच फैक्ट्री लाकर भरपाई करेंगी। हालांकि, फैक्ट्री बनेगी कैसे और टाटा अपनी जमीन क्यों देंगे, ऐसे तमाम सवाल उन्हें आशंकित कर रहे हैं। फिर भी ममता को राजनीतिक पुनर्जीवन देने वाले सिंगुर का कर्ज चुकाने में अगर तृणमूल सफल नहीं हुई तो पूरी पार्टी को इसकी कीमत जरूर चुकानी पड़ेगी। यह बात खुद तृणमूल प्रत्याशी रबींद्रनाथ भट्टाचार्य भी मानते हैं कि अगर सिंगुर में विकास रुका तो लोग क्षमा नहीं करेंगे।

Posted on Mar 26th, 2011
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Posted in :  राजनीति     
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