जातिगत जनगणना उचित है ?

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आजादी के बाद पहली बार जनगणना सन १९५१ में हुई थी उस समय भी जातिगत जनगणना का मामला उठा था. लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे इस आधार पर ख़ारिज कर दिया था क्योकि इस से सामाजिक तानाबाना बिगड़ जायेगा यह एक राष्ट्र भंजक मांग है. दूसरी जनगणना सन २००१ में हुई तब जे.डी.यू. तृणमूल कांग्रेस उस समय गठबंधन सरकार में शामिल थे तब कोई दबाव नहीं बनाया गया आज इसकी मांग करने वाले लालू, मुलायम यादव राजनीति के हादसे पर है. इसलिए दूसरी मांग करके अपनी राजनीति चमकाना चाहते है. जाति प्रथा समाज का एक फोड़ा है. जिसको दूर करने के लिए इसके लक्षणों को जानना आवश्यक है. बिना विश्वसनीय आंकडो के सामाजिक कल्याण की योजनाओ को सही तरीके से लागू नहीं किया जा सकता है. पिछली जनगणना मे जाति को आधार नहीं बनाया गया तो क्या जातिवाद दूर हो गया ? कुछ लोगो को भय है इससे वास्तविक स्थिति सामने आ जायेगी. जिस देश में नौकरी, विवाह, टिकट, पानी पिलाने में भी जाति पूछी जाती है वहां जाति आधारित जनगणना होनी ही चाहिए. जब अनुसुचित जाति, जन जाति की जनगणना होती है और उनसे धर्मं भी पूछा जाता है. केन्द्रीय शिक्षण में आरक्षण और मंडल आयोग को इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था हमारे पास पिछड़ी जाति का कोई सही आंकड़ा नहीं है न्यायालय ने पिछड़ी जाति के सम्भ्रांत लोगो को बाहर करने का आदेश पिछड़ा आयोग को दिया गया था जो जातिवाद जनगणना के बाद ही वास्तविक संख्या मालूम हो सकती है.

जातिगत जनगणना से वास्तविक लाभ चाहे किसी भी दल, पार्टी को हो लेकिन यदि दूसरा उद्देश्य जाति तोडो से है तो सभी जातियों की जनगणना होनी चाहिए ताकि वास्तविकता सामने आजाये.

भारत में पहली बार ऐसा लगता है. जहाँ से जातिमुक्त भारत साफ दिखाई पडता है. लेकिन इस आशा के साथ-साथ जाति प्रथा के संपूर्ण विनाश के लिए ठोस किस्म की रणनीति विकसित करनी होगी. उनसभी को जो आधुनिक होना चाहते है न्याय पूर्ण समाज की रचना चाहते है दल से ऊपर उठकर जाति के विनाश की सही रणनीति बनानी पड़ेगी. नौकरी में आरक्षण से दलित पिछड़े जातियों के आत्मविश्वास की लहर दौड गयी है. यही कारण है भारतवर्ष के राजनीतिक इतिहास मे पहली बार बहुसंख्यक शोषित समाज के इतने बड़े हिस्से में राजनैतिक सत्ता मे सीधी भागीदारी की इच्छा पली है. बल्कि प्रधान, सरपंच, से लेकर मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा है. आज सामाजिक न्याय की पार्टियों की पद्धति अन्य पार्टी यो की तरह ही है. इसमे भी लोकतंत्र पूर्णतः सुप्रीमो आधारित पार्टी है. आज बहुजन समाज पार्टी खड़ी है उसमे कशिरामका नेतृत्व एवं हजारों कार्यकर्ताओ का खून पसीना बहा है. बसपा भी जमीनी  विस्तार मे भाजपा, कोंग्रेस के तर्ज पर ही चल रही है. उस मे भी आतंरिक लोक तंत्र नाम की कोई चीज नहीं है. इसे मे सत्ता के भागीदारी वोट के कारण लंबे समय तक चल सकती है लेकिन सत्ता का न तो चरित्र बदलेगा और न जाति का विनाश होगा.

सामाजिक न्याय की पार्टिया अन्या पार्टियों की तरह अलौक्तान्त्रिक तो है ही साथ ही बहुजाति वादी ढंग से जाति जोड़ो के छल से वोट बैंक की राजनीति कर रही है. बहुजन समाज में अति दलित एवं महा दलित समाज समता वादी जाति तोडो की गुंजाईश सामान ही लगती है. जाति गणना की मांग करने वाले नेता मुलायम सिंह यादव को इस बात की जानकारी भी होगी की जिस नेता का पुण्य वे भुना रहे है स्वयं लोहिया ने बाबा साहब के बारे में कहा था गांधीजी के आतिरिक्त डॉ.आम्बेडकर देश के महान नेताओ में से एक थे. वह किसी भी अगली जाति के नेता से उन्निस नहीं थे. उनकी महानता वश मुझे यह भरोसा होता है कि एक न एक दिन भारत और हिंदू समाज जातिमुक्त होगा. क्या आज के उनके दल की कोई रणनीति है. उनके पास या कुछ इसके बारे मे सोच है. उत्तर होगा नहीं ? यह सही है…?

आज भारत जाति मुक्त समाज की तरफ बढ़ रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण है की हमारे देश मे  वोट राज के माध्यम से जनता में बराबरी की भुखमरी जागी है. दूसरा कारण है इस बराबरी की लड़ाई को दूसरे प्रदेशो से मदद मिल रही है और अब दलितो को गुलाम बनाकर रखना संभव नहीं है. यह अगड़ी जाति को मालुम हो चुका है. विकास के मौजूदा ढांचे के चलते ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन संकट, आतंकवाद की चुनौतियों की प्रकृति एसी है कि सनातन हिंदू लोकतंत्र के बजाय भी राज और समाज चल सकता है. जैसा कि अन्य प्रदेशो, देशो मे देख सकते है.

दलितो के लिए तो पहले से हो आरक्षण को व्यवस्था थी लेकिन जाति आश्रित वोट बैंक कि राजनीति का आज भी उन्हें कोई फायदा नहीं मिल रहा है. जो दलितोमे महादलित, पिछडो मे भी सबसे पिछड़े जातियों है वे जहा थे वही पर है.

दो दशक पहेले तक राजनीति में सत्ता की चाबी जहा अगदी जाति प्रथा खत्म नहीं हुई यह दुखद है. दलितो के लिए तो पहेले से ही आरक्षण की व्यवस्था थी लेकिन जाति आश्रित वोट बैंक की राजनीति का आज भी उन्हें कोई फायदा नहीं मिल रहा है जो दलितो में महा दलित है पिछडो में सबसे पिछड़ी जातिया है.

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर ओ.बी.सी. को नौकरियो में जो आरक्षण देने की जो व्यवस्था की, उसका असर राजनितिक गोल बंदी को ज्यादा हुआ. उत्तरप्रदेश मे इसी लहर ने ही मुलायम सिंह यादव, मायावती, कल्याण सिंह जैसे जाति के नेताओ को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया. मायावती ने तो ऐसा खेल खेला की तमाम अगड़ी हिंदू जातियो को लगभग हासिये पर ला खड़ा कर दिया है. उमा भारती को मुख्यमंत्री भाजपा ने बनाया तो वह भी जातिगत समीकरण के ही कारण अशोक गहलौत का कद ऊंचा है. वह भी इसीका नतीजा है. सभी जातियो में पिछड़ी जातियों को जोडने की होड आज भी लगी हुई है.

कांग्रेस, भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलो को भी उनकी ताकत का एहसास होने लगा है. वोट बैंक हथियाने के लिए पिछड़े प्रतिनिधि देना मजबूरी हो गयी है. बगैर इस वोट बैंक के कोई दल अपनी ताकत नहीं बढ़ा सकता है. इसी कारण आज लोक सभा में इनकी संख्या बढ़ रही है.

यदि हम भारत में समता मूलक समाज की रचना करना चाहते है तो हमें जाति प्रथा का उत्मुलन करना होगा. जाति प्रथा बहु संरक्षित लोगो को दिमागी तौर पर अपाहिज बना देती है. इसके कारण मुस्ठी भर लोग ही सबल होते है. इसी के कारण कामगारों कि इज्जत कम हो जाती है कुर्सी पर बैठकर एसो आराम वालों कि इज्जत बढ़ जाती है भारत मे चली आ रही यही विषमता, अक्षमता और अयोग्यता का मूल कारण है. जाति प्रथा भारत में नहीं होती तो भारत बहुत पहेले ही सफल, समृद्ध राष्ट्र बन जाता. इसके लिए हमें मेरी जाति ”हिन्दुस्तानी” का नारा बुलंद करना होगा, जनगणना से जाति को हटाना होगा.

सभी व्यक्तियो को जाति सूचक उपनाम हटाना होगा, नौकरी मे आरक्षण समाप्त करना होगा, बल्कि आरक्षण गरीबी के आधार पर देना होगा, सभी संगठनो पर पाबन्दी लगानी होगी जो जाति आधारित है. जाति के नाम पर डिग मारने वाले को सजा दी जानी चाहिए तभी जाति प्रथा का उन्मूलन होगा, समता वादी समाज की रचना की जा सकती है.

Posted on Sep 28th, 2010
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Posted in :  सत्ताधिकारी, सरकारी-तंत्र     
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