जमीन अधिग्रहण

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भारत मे आबादी बढ़ रही है. अन्न की जरूरते बढ़ रही है लेकिन कृषि भूमि कम हो रही है. सरकार औद्योगिक घरानों पे महेरबान है. पश्चिम बंगाल के सिंगुर और नंदीग्राम किशन संघर्ष ताजा है. उत्तरप्रदेश, अलीगढ, आगरा, मथुरा के किसानो के संघर्ष सुर्खियों मे पुलिश की गोली, लाठी से कई व्यक्तियो की जाने गयी है. तमाम घायल भी हुए, संसद चुप है. राज्य सरकार कटघरे मे है. सरकार यमुना एक्सप्रेस हाईवे के नाम पर हजदो एकड़ जमीनएक औद्योगिक समूह के लिए अधिग्रहित की है. किसान नोयडा की दर से मुआबजा भोग रहे है. सभी दल आंदोलन मे कूदे. राजनाथ सिंह, अजित सिंह, राहुलगाँधी किसानो से मिल चुके है, पच्चीस अगस्तको उत्तर प्रदेश बंद था. ठीक मुआबजे के साथ अंग्रेजी राज कानून जो सन १८९४ मे बना था उसमे संसोधन की मांग कर रहे थे, लेकिन अर्थ शास्त्री प्रधानमंत्री योगना आयोग के आधिवेता निति नियंता किसान और कृषि को सिर्फ आकड़ा मानते है, प्रश्न उठता है ११६ वर्ष पुराने कानून को अब तक संसोधन क्यों नहीं किया गया ? क्या अलीगढ टप्पल गोली कांड का इन्तेजार था. २००७ मे  इसके संसोधन को विधेयक भी तैयार था. भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगो को रहत देने के लिए लेकिन बढ़ा भी, घटा भी जरा रह गया.

भूमि अधिग्रहण कानून १८९४ मे जनहित के साथ काम्पने हित मे भूमि अधिग्रहण के लिए अधिकार लिये थे. लेकिन यह कानून भी किसी राज्य सरकार को कंपनियों, व्यावसायिक हितों मे भूमि अधिग्रहण के लिये मजबूर नहीं करता है. सरकार अपने हित मे कंपनी हित को जनहित बताती है. उ.प्र., पश्चिम बंगाल के सहमेल साफ है. सन २००७ मे कंपनी बंद हटाने की बात थी.  बेशक इससे कंपनी के लिए प्रावधान था कि निजी सेल कर्म अपनी योजना के लिये सीधे किसानो से रेट तय करके ७०% जमीन स्वयं लेनी थी इसके बाद ३०% जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहण करके कंपनी को दे देना था. यह सवाल है कि सरकार भी ३०% जमीन जबरदस्ती छीने लेकिन सप्रंग सरकार ने २००७ के विधेयक मे व्यावसायिक हित की ही पैरकी है कि कठिनाइयों के मददेनजर प्रस्ताविक उद्योग योजना को निरस्त करने  की व्यवस्था होती. किसान कृषि धर्म का नियंत्र है. वही शोषित है पीड़ित है पूंजीपतियों के लिये उसी की जमीन छीनी  जाती है. कृषि हित मे पूंजीपतियों के प्रसाद क्योक नहीं अधिग्रहण होते. खेती का अधिग्रहण होता है. सेना अस्पताल, स्कूल के लिये सीमेंट, लोहा, पत्थर का अधिग्रहण कभी नहीं होता यह अन्याय है.

मुक्त अर्थव्यवस्था मे क्रेता और विक्रेता स्वतन्त्र होते है. विक्रेता अधिकतम दर पर बेचता है. क्रेता निम्नतम दर पर खरीदता है. लेकिन किसान अपनी जमीन, गॉंव, खलिहान मन माफिक दरों पर बेचने के लिये स्वतन्त्र नहीं है. सरकार औद्योगिक घरानों के लिये उपजाव जमीन का अधिग्रहण कर रहे है. वैसे भी किसान आहात हताश और आत्मा हत्या पर उतारू है. औद्योगिक घरानों को अचल सम्पति बनाने के लिये भरी छूट दे रही है. परियोजना को विचाराधीन रहते हुए भी अधिग्रहण जारी है. राज्य सरकारे किसानो से जमीन छिनने और बड़े घरानों को देने के कम मे अति उत्साही है.

संविधान का अनुच्छेद ४८ मे क्रिशिओर पशुपालन को आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के निर्देश दिए है. लेकिन सरकार अपना दायित्व नहीं निभा रही है. पूंजी पतियों के लिये जमीन किसानो की छीनी जा रही है. औद्योगिक पूंजी का अधिग्रहण नहीं होता है तो किसानो की पूंजी का अधिग्रहण का कहाँ का न्याय है…? गॉंव जारहे है, खेत जारहे है, खेत जा रहे है लाखो ग्रामीण किसान, मजदूरों, कारीगरों के विस्थापन की समस्या सामने है. औद्योगिक उत्पात बाजार भाव पे बिकते है. अपने उत्पाद की कीमत वे स्वयं तय करते है. कृषि उत्पाद गेहू, चना, गन्ना, कृषि भूम की कीमत सरकार तय करती है. किसान सरकार की प्रजा है. शासित और शोसित है, उद्यमी सरकार के पोषक, सरकार उनके साथ है, उनकी चाकर है, तो क्या भारतीय राजतन्त्र पूंजी पतियों के लिये, पूंजी पतियों द्वारा संचालित पूंजी पतियों का शासन है.

धारा ४९ सेज के हित मे बाधक है. इस विधेयक सहित किसी भी अधिनियम की धारा को निरस्त करने का अधिकार देती है. इस धारा का तमाम विरोध किया गया. नया कानून आया, और नये कानून का लाभ ददेखकर मारामारी मची. किसान विस्थापित होना सुरु हो गये, तभी से किसान आंदोलनरत है.

रिजर्व बैंक अंतरराष्ट्रीय मुद्या कोष जैसी संस्थानो ने निम्न मुद्दे उठाये.

१. भूमि सिमित है, सेना, सार्वजनिक अस्पताल, विद्यालय और सरकारी दफ्तर की बात  ठीक है. क्या व्यावसायिक हितों के लिये भी भूमि अधिग्रहण उचित है…?

२. खाद्यान, आत्मनिर्भरता, स्वतंत्रता, स्वावलम्बन की प्रथम गारंटी है. तो क्या फासले देने वाली कृषि भूमि का अधिग्रहण न्याय उचित है…?

३.  कृषि भूम के मालिक से सस्ते दर पर जमीन लेकर व्यापारियों को उची दर पर देना कहाका न्याय है.

४. परियोजना के कारण विस्थापित किसानो को कृषि परियोजना का अंशधारक नहीं बनाया जा सकता है.

५. अधिग्रहण कानून बनकर व्यावसायिक कार्यों के लिये भूमि अधिग्रहण पर रोक लगाना, राष्ट्रीय आवस्यकता नहीं है.

६. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृषि उपज बढ़ाने के लिये क्या सरकार इसी तर्ज पर छूट देकर विशेष कृषि क्षेत्र बनाना चाहती है.

७. राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय विरोध के चलते नये कानून संसद मे नहीं लाए जा सकते, मुठ्ठी भर औद्योगिक घरानों के लिये लाखो किसानो को बेघर बार करना कोई राष्ट्रीय हित नहीं है…?

भोले भले किसान खुद को मर रहे है नक्सली दूसरों को. निम्न मध्यम वर्ग तिल-तिल मर रहा है, जंगल राज मे शक्तिशाली कमजोर को खा जाता है अर्थव्यवस्था पर भी यही बट लागू होती है. मुक्त अर्थव्यवस्था ने बाजार को जंगल बना दिया है. व्यापारी प्रत्यक्ष उत्पादन मे हिस्सा नहीं लेते, मुनाफा कमाना उनका उद्देश्य है. अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण राज्यव्यवस्था का कर्त्तव्य है. उत्पादन की शैली, गति, प्राविधि, प्रविध पर उसका नियंत्रण नहीं है. उत्पादन प्रणाली मे देश के करोडो लोगो की कोई भागीदारी नहीं है. यह उपयोगी वस्तुओ की बजाय उपभोक्ता वस्तुए बनाते है. सौंदर्य प्रसाधन, कोल्ड ड्रिंक्स, बोतलबंध पानी, दारू, मनोरंजन सामग्री, भारत की मुलभुत जरूरते नहीं है. पांच सितारा होटल, डांसबार, पिकनिक स्पोट, मल्टीप्लेक्ष, फार्महाउस, धन्ना सेठो का वेळ है. सरकारी अस्पताल बीमार है. उनकी जगह महंगे नर्सिंग होम है. गरीबी की रेखा है पर अमीरी की कोई रेखा नहीं है. बड़े घराने सामाजिक दायित्व नहीं निभाते है. वे कमजोरों को विशेष सुविधा देने की बात पर आँख तरेरते है.

इस अर्थव्यवस्था मे कृषि लागत बढ़ी सरकार ने हाथ खिंच लिया श्रमपूंजी का प्रतिफल घटा सौंदर्य प्रतियोगिता मक्दानोल्ड पिजा की बहार आयी, मजदूर किसान किटनासक खाकर आत्म हत्या कर रहे है हजारों लोग करोड पति सैकडो अरबपति बने, काले धन का हिसाब नहीं है बिना किसी उद्यम के ही राजनेता अरबपति की सूचि मे आते है इनकी दौलत चादनी बार से चाँदके पर पहुँच गयी है, ये ही जमीन हथियाने मे संग्लग्नहै, गरीब उजड रही है ये विकास के नाम पर अपनी दुकान चला रहे है, सरकार उन्हें सहूलियतें भी दे रही है, सरकार रिलायंस को मुम्बई मे ३५००० एकड़ जमीन कुडियो के भाव दिया, ऐसे तमाम उदाहरण है. सरकार की निगाह मे बहुराष्ट्रीय कंपनियां और बड़े घरानों द्वारा लगये जा रहे उद्योग ही विकास है. विकास का मतलब विदेसी पूंजी निवेश डब्लू. टी ए.के सामने पंचसितारा सभ्यता नहीं है.

केन्द्र अघोषित रूप से “कर्पोरेट कृषि” की तैयारी कर रहा है कृषि छेत्र का विकाश महज किसान समस्या नहीं है यह पुरे देश के  खद्यान सुरछा का सवाल है. खाद की उपलब्धता और सब्सिडी किसानो पर कृपा नहीं होती अमेरिका सहित तमाम विकसित देश अपने किसानो को देते है लेकिन भारत मे इसे समाप्त करने की मांग करते है अन्न उत्पादन की तुलना औद्योगिक उत्पादन से नहीं हो सकती है, अन्न आत्मनिर्भरता दुनिया के प्रत्येक देश का प्रथम लक्ष्य होता है.

भारतीय किसान बाजार की निर्मम शक्तियों के बीच अकेला है सरकार बाजार मूल्यों को प्रभावित करने के लिये क्रेता / विक्रेता बनती है. वह किसान को प्रोत्साहक मूल्य को दिलाने के लिये बाजार मूल्य की तुलना मे ज्यादा कीमत देकर अन्न खरीदती है गरीबो को उचित दर पर उपलब्ध करने केके लिये कम दम पर अनाज बेच कर विक्रेता भी बनती है, ल्व्किन लेकिन केन्द्र सरकार भारतीय बाजार मूल्य की तुलना मे ज्यादा धन देकर विदेश से गेहू का आयात करती है, भारतीय किसान से महंगा गेंहू नहीं खरीद सकती क्योंकि उसकी प्राथमिकता विदेसी किसान है. केन्द्र पर विश्व व्यापर संगठन जैसे भारत विरोधी साम्राज्य वादी दबाव है.

केंद्र राज्य सरकारे प्रति वर्ष हजारों करोड रुपये का खर्च कृषि मंत्रालयों, निधेशालाओ जिला स्तरीय कृषि कार्यालयों, निचले स्तर के कर्मचारियों एवं अधिकारियो पर करती है. ऐसा सारा खर्च गैर योजना गत व्यय होता है. केंद्र राज्य की किसीभी दल की सरकारों ने इस बड़ी अनुत्पादक धनराशी से होने वाले फायदे के आंकड़े नहीं जुटाए. सिचाई, बीज, खाद, पानी, बिजली, हल, बैल, ट्रेक्टर, इंजिन, का जोड़ ही कृषि कर्म है. सिचाई मंत्रालय कृषि विभाग से अलग काम करता है. बिजली विभाग अलग है. कृषि मूल्य आयोग अलग काम करता है. योजना आयोग पूरी अर्थव्यवस्था का मालिक है. कृषि विभाग किसानो का मार्गदर्शन भी नहीं करता है. सवाल यह है कि केन्द्रीय कृषि मंत्री राज्यों के कृषि मंत्री इनके विभाग करते क्या है. कृषि क्षेत्र को कृषि विभाग से लाभ क्या है…?

मुक्त बाजरे सरकार कि भूमिका काम हो गयी है. केंद्र अब ललोग कल्याण कारी नहीं रह गया है. वह कर्पोरेट जगत का हित रक्षक पोषक है. सेंसेक्स का उत्तर चढाव ही अर्थव्यवस्था का कारक है. अमीरी बढ़ी गरीबी नहीं घटी, बल्कि तेज रफ़्तार से बढ़ी है. कृषि क्षेत्र मे करने के लिये उसके पास बहुत कुछ था. सिंचाई विभाग मे बिजली कि समस्या नहेरे सब धवस्त हो गयी है. उ.प्र. मे खाद को लेकर मारा मारी है. सभी राज्य पॅकेज मांगते है. कहीं बाद है तो कही सुखा है. कृषि क्षेत्र मे रजक सरकार ने ९ प्रतिशत व्याज पर, कृषि क्रेडिट कार्ड पर लोन उपलब्ध कराया, यह स्वागत योग्य है. कृषि क्षेत्र मे भरी पूंजी निवेश कि आवश्यकता है. इसे सरकार को स्वयं करना चाहिए. आहात किसान खुद कशी पर उतारू है. गुस्साए किसान किसी भी सीमा तक जा सकते है. तब देश दाने दाने का मोहताज हो जायेगा.

Posted on Sep 28th, 2010
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Posted in :  खबर, हिंदुस्तान     
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