अब आए हैं गुरु के भी गुरु

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मशहूर कहावत है, गुरु गुड़ रह गए,  चेला चीनी बन गया। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कोच गैरी कर्स्ट्न टीम इंडिया के नए कोच डंकन फ्लेचर के चेले रहे हैं। बात उन दिनों की है, जब कर्स्ट्न यूनिवर्सिटी आफ केपटाउन की टीम में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे और डंकन यूनिवर्सिटी टीम के नए कोच बनकर आए थे। उस वक्त कर्स्ट्न नौवें नंबर पर खेलते थे। डंकन ने उन्हें ओपनिंग करने के लिए प्रेरित किया।

दरअसल, डंकन का मानना था कि तकनीकी तौर पर कर्स्ट्न ठोस खिलाड़ी नहीं हैं, लेकिन उनके अंदर हौसला और आत्मविश्वास है। इसके बाद तो कर्स्ट्न का ओपनिंग बैट्समैन का इतिहास-भूगोल क्रिकेट प्रेमियों के सामने है। यूं भी गंभीर और नाजुक मोड़ पर कर्स्ट्न भारतीय टीम के कोच रहते हुए भी डंकन से सलाह लेते थे। अब गुरु की बारी है। देखना है, अपने चेले कर्स्ट्न की तरह वह टीम के लिए चीनी साबित होते हैं या फिर गुड़ ही रह जाते हैं। डंकन के सामने चेले कर्स्ट्न ने बड़ी चुनौतियां रखी हैं।

गुरु बनाम चेला

कर्स्ट्न ने टीम इंडिया को टेस्ट रैंकिंग में टॉप तक पहुंचाया। और तो और उन्होंने वर्ल्ड कप पाने की भारत की 28 साल लंबी प्यास भी बुझाई। फिलहाल अगले महीने शुरू होने वाले वेस्टइंडीज दौरे में डंकन के सामने वर्ल्ड कप का ताज सिर पर रखे टीम इंडिया को सीरीज जिताने की चुनौती होगी। वैसे माना जाता है कि डंकन दुनिया में अपनी तरह के अकेले कोच हैं। शांत। समय पर सही बोलने वाले। बेहतरीन रणनीतिकार। टीम को परिवार समझने वाले। सीनियर खिलाड़ियों से तालमेल बिठाकर चलने वाले। शादी उन्होंने की नहीं है, इसलिए टीम के सदस्य ही उनका परिवार होते हैं।

नहीं रहे बड़े क्रिकेटर

27  सितंबर 1948 को साउथ रोडेशिया (हरारे) जिंबाब्वे में जन्मे डंकन का एक क्रिकेटर के तौर पर लंबा-चौड़ा इतिहास नहीं है। उन्होंने कभी टेस्ट क्रिकेट नहीं खेला। वन डे मैच भी उन्होंने सिर्फ छह खेले हैं, लेकिन इतने छोटे करियर में कुछ यादगार मौके उन्होंने क्रिकेट जगत में दर्ज किए हैं। डंकन जिंबाब्वे के पहले कप्तान रहे हैं। उन्होंने जिम्बाब्वे क्रिकेट के लिए बहुत कुछ किया। 1982 में जिम्बाब्वे को आईसीसी ट्रॉफी जिताने वाले डंकन की कप्तानी में ही जिम्बाब्वे ने 1983 के वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया जैसी ताकतवर टीम को शिकस्त दी। डंकन इस मैच में मैन ऑफ द मैच थे। बेशक बतौर क्रिकेटर उनके पास झिलमिलाते आंकड़ों का अंबार न हो, लेकिन एक कोच के रूप में उनकी गिनती दुनिया के सफलतम कोचों में की जाती है।

किस्से कामयाबी के

डंकन इंग्लैंड टीम के साथ 1999 से लेकर 2007 तक कोच के रूप में जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने इंग्लैंड को टेस्ट रैंकिंग में नंबर दो तक पहुंचा दिया। डंकन के समय में 2000 से लेकर 2004 तक इंग्लैंड ने श्रीलंका, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका को टेस्ट सीरीज में मात दी। 2004 में इंग्लैंड ने लगातार आठ टेस्ट जीतने का रेकॉर्ड भी बनाया। इंग्लैंड टीम के कोच के रूप में डंकन का यादगार पल सितंबर 2005 में आया, जब उनकी टीम ने ऑस्ट्रेलिया को 18 साल बाद प्रतिष्ठित एशेज सीरीज में हराकर इंग्लैंड को लगभग दो दशक बाद एशेज सिरीज दिलवाई। वर्ल्ड कप 2007 के बाद डंकन इंग्लैंड के कोच पद से हट गए, लेकिन इसके बावजूद वह काउंटी और क्रिकेट क्लब को कोचिंग देते रहे।

टीम इंडिया के साथ वह अपना नया कार्यकाल आगामी वेस्टइंडीज दौरे से शुरू करेंगे। कर्स्ट्न ने अपने पीछे एक शानदार विरासत छोड़ी है। उसे गुरु डंकन को संभालना और आगे बढ़ाना है। वह ऐसा कैसे करते हैं, यह अभी देखना बाकी है। यकीनन इसके लिए उन्हें भाग्य का ही साथ चाहिए और इसके लिए भी उन्हें ही संघर्ष करना है।

Posted on May 1st, 2011
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Posted in :  खेल्र     
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