भारत मे संसदीय प्रणाली असफल

Font Size : अ- | अ+ comment-imageComment print-imagePrint

नक़ल कभी असल नहीं होती. उधार कपडे व्यक्तित्व मे कभी निखार नहीं लाते. विदेशी संस्कृति का अनुकरण कभी समय नहीं बनाता है. राष्ट्र और राष्ट्र निर्माण की संस्थाए स्व संस्कृति मे फलती फूलती है ब्रिटिश तर्ज पर बनी भारतीय संसद ने निराश किया.

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम निवर्तमान राष्ट्रपति ने भारतीय सांसदों को प्रशिक्षण का आग्रह किया था लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने मान्यवरो के हुल्लड बाजी से जले भुने संसदीय कार्य संचालन नियमावली को ही जलाने का आग्रह कर दिया. संसदीय गरिमा का पतन हुआ यह तो होना ही था इसमे नया क्या है. भारतीय संसद व्यवस्था ब्रिटिश संसद कि उधारी है. ब्रिटिश संसदपरिवार भारत के लिये उचित नहीं है.

महात्मागांधी ने १९०९ ब्रिटिश संसद पर तल्ख़ टिप्पणी की थी- “पार्लियामेंट बाझ है”. बाझ इसलिए की अब तक उसने एक भी अच्छा काम नहीं किया है, इतना समय धन यदि अच्छे लोगो को मिले तो राष्ट्र का उद्धार हो जाये. यह टिप्पणी तब की थी जब ब्रिटिश संसद ही भारत के लिए कानून बनाती थी.

भारत ने संविधान निर्माण अपनी संसद की प्रेरणा वैदिक काल, कौटिल्य या गणतंत्रो से नहीं ली ब्रिटिश संसद की नक़ल की. संसद को बजट पारण, विधि निर्माण, संविधान संसोधन के अधिकार मिले उम्मीद थी कि  संसद राष्ट्र के हर्ष-विषाद देश काल का ह्रदय की धडकन बनेगी. लेकिन सारे सपने बिखर गये.

देश प्रेम, स्वदेशी, वंदे मातरम की भावभुमि वाले राजनेता प्रथम चुनाव (१९५९-५२) के जरिए संसद मे आये. पहली संसद मे पंडित नेहरू, पुरुषोतम दास टंडन, और व्यंकट रमण सेठ गोविन्द दास आदि सत्ताप्रति थे. डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी, आचार्य कृपलानी और कामथ जैसे विपक्षी नेता उसके पास तेजस्विता थी, तर्क थे, प्रतितर्क थे, सत्ता पक्ष का उत्तरदायित्व बोध था.

दूसरी लोकसभा दहेज कानून को लेकर पहली बार संसद के दोनों सदनों का साझा अधिवेशन हुआ. अटल बिहारी बाजपेयी, पंडित नेहरू के एवं पूर्व सचिव पर विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया नेहरू ने स्वीकार किया.

तीसरी लोकसभा का कार्यकाल कष्टप्रद रहा. चीन का हमला, भारत पाक युध्ध, संसद की ताकत के चलते रक्षा मंत्री हटाये गए. गो-हत्या विरोध आंदोलन को हिंसा को लेकर गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को भी हटना पड़ा. लोकसभा मे लोहिया भी थे. संसद वजनदार थी और सरकार छोटी.

पांचवी लोकसभा संसदीय इतिहास मे सबसे ज्यादा (५ वर्ष १० माह) चली, नागर वाला कांड उठा, आपात काल लगा इस पर चौदह घंटे  बहस चली, संपूर्ण विपक्ष की अनुपस्थिति मे भारतीय संविधान संसोधन हुआ. सरकार ने संसद का दुरुपयोग किया. संसद कमजोर हुयी. सरकार ने संसद का कार्यकाल बढ़ाया. इसीलिए श्रीमती इंदिरागांधी संसद लोक सभा की याद दिलाती है.

छठी लोकसभा सिर्फ ढाई साल चली इसमे पूर्व लोकसभा द्वारा लिए गए संविधान विरोधी फैसले को पलट दिया गया आपसी कलह मे जनता पार्टी की सरकार धारासायी हुयी. चरण सिंह प्रधानमंत्री बने संसद का मुह देखे बगैर त्याग पत्र देने के लिए विवश हुये.

सतवी लोकसभा श्रीमती गाँधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर से आठवी लोकसभा आई दल बदल कानून सहित १३ संविधान संशोधन व् ३०० से ज्यादा विधेयक पारित हुए. दसवी लोकसभा मे झामुमो संसद रिश्वत कांड हुआ. घोटाले हुए. ग्यारहवी, बारहवी, तेरहवी, लोकसभा जग जाहिर है.

मनमोहन सरकार लोकतंत्र नोट तंत्र बना रिश्वत के नोट लोकतंत्र के पवित्र मंदिर में लहराए गए. राजनैतिक दल परत दर परत चरित्र हीनता और दलाली के दल-दल मे डूबते दिखाई दिए. परमाणु डील के बहाने ढेर सारी डिले हुयी लीडर डीलर बने एक अजब गजब महाभारत हुए दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ध्वस्त हो गया. इस महाभारत मे कौरव पांडव दोनों एक जैसे थे. दोनों ने संस्कृति मर्यादा का चीरहरण किया. महाभारत मे युधिस्ठिर ने कहा था की- जैसे मांस लोभी कुत्तों की गति होती वही गति राज्य आशक्ति से हम सब की हुयी है. अतः इस मांस तुल्य राज्य का परित्याग करना चाहिए. पक्ष विपक्ष को इस पर पश्चाताप करना चाहिए. सरकार और संसद के इक़बाल पर जन भरोसा नहीं बचा.

संविधान का अनुच्छेद १०५ (२) मे संसद के भीतर दिए गये वोट या कथन को लेकर के कोई मुक़दमा न चलाने का निर्देश है. भारत के संविधान में यह प्राविधान ब्रिटिश परंपरा की कार्बन कापी है. यू.के. बिल ऑफ राइट्स के अनुच्छेद ९ मे भी सांसदों को वोट या भाषण के आधार पर मुकदमो से संरक्षित किया गया है. शिबू शोरेन के मामले मे इसी आधार पर उन्हें मुक्त करदिया गया. बेशक स्ट्रिंग ऑपरेशन मे कारवाई हुई पर राज रोग जस का तस है.

संसदीय प्रणाली आजादी के ६३ वर्ष के भीतर ही असफल हो गयी. संसद मे महंगाई के मुद्दे पर परस्पर कई दिन तक अपना कामकाज नहीं कर सकी. विपक्ष बहस के बाद मत विभाजन चाहते थे. यह एक साधारण और वाजिब मांग थी. लेकिन सत्ता पक्ष के लिए असुविधा जनक थी. हंगामा होता रहा, कामकाज रुका रहा. उड़ीसा विधानसभा में विपक्ष दो सप्ताह बहिष्कार कार्यक्रम चलाया. बिहार विधान सभा मे सत्ता पक्ष विपक्ष मे जम कर तकरार हुई. कांग्रेस प्रति पक्ष ने गमले तोड़ कर गुस्सा जताया. कर्णाटक विधान सभा मे विपक्षी हेलमेट पहन कर कारवाई मे बाधक बने. उत्तर प्रदेश मे दोनों पक्ष मे जम कर तकरार हुई और विधान परिषद मे दोनों पक्ष मे एक दूसरे की सरकार को गुंडा राज बताया. लोक सभा मे केन्द्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी ने महंगाई के मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी राजग सरकार पर डाल दी. महंगाई मुख्य मुद्दा पीछे हो गया. सरकारी जवाबदेही का सिद्धांत धरा रह गया.

भारतीय राजनीत मे संविधान के प्रति निष्ठा भाव नहीं अपनाया. अनेक राज्यपालो के आचरण,  इंदिरागांधी की आपातकाल प्राविधान का दुरूपयोग, मनमोहन का सांप्रदायिक आधार पर बजट बनवाना, जिसकी इजाजत संविधान नहीं देता. विश्वास मत के पक्ष मे दल बदल करवाना. भय, लोभ, प्रलोभन, हथियार स्वयं प्रधानमंत्री ने चलाये और चलवाए. फुटकर डील हुई, थोक डील हुई, सरेआम डील हुई, तमाम सांसदों ने हुल्लड बाजी किया, लोकसभा की कारवाई बाधित हुई, क्या सिर्फ सात-आठ माह की सत्ता के लिए नग्न महाभारत की आवश्यकता थी…?  भारतीय संविधान असफल हुआ. यह पहेले से ही भारतीय संस्कृति के विरुद्ध था.

सरकार का अस्तित्व लोक सभा विधान सभा के बहुमत मे है. प्रधान मंत्री मुख्यमंत्री के सभी मंत्रीगण संसद विधान मंडल के ही सदस्य है. वे ऐसे सदनों के प्रति जवाबदेह है. धीरे धीरे इसकी गरिमा गिरी प्रश्न पूछने वाले तमाम सदस्य संसद मे उनुपस्थित पाए जाते है. संसद विधान मंडलों के अधिकार व्यापक है. कोई दूसरी संवैधानिक संस्था संसदीय कामकाज मे हस्तक्षेप नहीं कर सकती. संसद और विधान मंडल अपनी कार्य संचालन, नियमावली स्वयं तय करते है. लेकिन सत्ता पक्ष अड़ियल रुखा अपना रहे है. सरकारी जवाबदेही घटी है. सत्ता पक्ष ही कार्यपालिका है. विधायी नीति का निर्धारण व जरुरी नये कानूनों के विधेयक वही लाता है. विधि निर्माण के काम मे बगैर गहन विचार हुए शोर शराबे मे पास कर दिया जाता है. संसद विधान मंडल ही कर लगाते है. राजस्व एकत्रित करने और जरुरी काम पर खर्च करने की अनुमति देती है, वही उपयुक्त प्रयोजन की छानबीन करती है. लेकिन व्यव्हार मे ऐसा नहीं है. सता पक्ष बहुमत का नाजायज फायदा लेता है. यह विपक्ष की सार्थक आपत्ति युक्ति युक्त आलोचना और जन हितैषी सुझावों पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है. आम जनता ठगी रह जाती है. अरबो खरबो के बजट अनुदान चन्द मिनटों मे पारित हो जाता है.

आम जन संसदीय प्रणाली संविधान नहीं जानते है. सांसदों विधायको कार्यपालको से संविधान नियमावली का विशेष सम्बन्ध है. आम जन मौलिक सुविधा चाहते है. रोटी, रोजी, शिक्षा, स्वास्थय जैसी मौलिक आवश्यकताओ मे ही संविधान और संसदीय परंपरा की कामयाबी है. राधाकृष्णन ने ठीक कहा था जो गरीब इधर उधर भटक रहे है. जिनके पास कोई काम नहीं है, जो भूखे मर रहे है वे संविधान और उसके विधि पर गर्व नहीं कर सकते. आज गर्व करने लायक बचा ही क्या है…? संसदीय असफलता ने लाखो गरीब युवको को विद्रोही बनाया है. देश के सभी प्रमुख दल आगे पीछे सत्ता मे रहे है. सत्ता पक्ष अपनी सही आलोचना को ही स्वविकार नहीं करते. वे पूर्ववर्ती सरकार की गलतिया गिनाते है. बुनियादी सवाल है कि संसद विधान मंडल अतीत पूर्ववर्ती सरकार का कच्चा चिठ्ठा खोलने के लिए ही है…? या राष्ट्र को समग्र वैभव संपन्न बनाने के लिए, युक्ति युक्त मार्ग खोजने के लिए है…?

संसदीय प्रणाली असफल हो गयी है…? भारत को नये संविधान कि आवश्यकता है…?

राजनीतिक दल लोकतंत्र की बात करते है और अपने दलो मे हाईकमान वाद/व्यक्तिवाद चलाते है. दल ही राजनितिक विचार का जनतंत्र का प्रशिक्षण केन्द्र होते है. इस संसदीय प्रणाली ने नये मगर भ्रष्ट महाराजा बनाये. लोक सभा का आचरण दलीय प्रशिक्षण नोटतंत्र की ही असल अभिव्यक्त है. दलो मे संविधान नहीं चलता सो संसदीय व्यवस्था मे भी संविधान का अनादर होता है. आम्बेडकर ने कहा यदि विधान के अंदर कोई गडबडी पैदा होती है इसका कारण यह नहीं की विधान खराब था बल्कि यह कहना चाहिए की अधिकारारुढ व्यक्ति ही अधम, नीच है. संविधान, संसद और चरित्रहीन दलो ने निराश किया है. संसदीय प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है. अतः हमें नये संविधान की आवश्यकता है.

सांसदों, विधायको, मंत्रीगणों पर आये दिन रिश्वत घोटाले के आरोप लगातार लग रहे है, माफिया और अपराधी तत्त्व भय, आतंक और नोटतंत्र के जरिये “अबे” से “मान्यवर” हो रहे है. जो चुनाव के पहले दो पहिये स्कूटर भी नहीं जुटा पाते थे, वे सांसद, विधायक होते ही करोडो-अरबो के मालिक हो जाते है. आय से अधिक सम्पत्ति के जाँच मे गिफ्ट को आय मे शिफ्ट करते है. सरकारे बदलती है, पर सरकार और राजनेता के चरित्र मे बदलाव नहीं होता, संसदीय प्रणाली मे व्यक्ति आधारित हाई कमान संचालित प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसा राजनितिक दलो का विकास हुआ. यहाँ दल नहीं छोटी बड़ी कंपनियों के टकराव है. लीडर पृष्ठिभूमि है. डीलर अगुवा है. बाई द डीलर, ऑफ द डीलर, फॉर द डीलर का प्रभुत्व है.

गांधीजी ने ”हिंदू स्वराज” मे लिखी बात आज सत्य हुई जो उन्होंने ब्रिटिश पार्लियामेंट के बारे मे लिखा था-  “में भगवान से यही प्रार्थना करता हू की हिंदुस्तान की एसी हालत कभी न हो जिसे आप पार्लियामेंटो की माता कहते है, वह पार्लियामेंट तो बाँझ और वेश्या है.” गांधीजी की यह आलोचना संसदीय प्रणाली पर सत्य हुई. संसदीय प्रणाली असफल हो गयी है, जन गण मन हताश है संविधान के सपथी चिंतन करें. विद्रोह की पदचाप पर ध्यान दे

Posted on Sep 28th, 2010
SocialTwist Tell-a-Friend
Posted in :  सत्ताधिकारी, सरकारी-तंत्र     
Subscribe by Email

3 Responses to " भारत मे संसदीय प्रणाली असफल "

  1. arun says:

    this is post

  2. amit says:

    second post

  3. jessees11 says:

    Started new snare project
    sexy videos search android programming books for beginners xxx sexy girls videos download android market free games download to mobile porn apps frede download
    http://adult.google.play.lastnews.in/?leaf.katherine
    free full version android games sexy vedio download com playstore playstore playstore porn app for android phone free download sex video free download

Leave a comment

Type Comments in Indian languages (Press Ctrl+g to toggle between English and Hindi OR just Click on the letter)


विदेश

राज्य

महिला

अपराध

ब्यूटी