लोकलेखा समिति की जांच राजनीति की भेंट चढ़ी

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2-जी स्पेक्ट्रम जैसे अहम मसले पर संसद की प्रतिष्ठित लोकलेखा समिति, पीएसी, की जांच पहले दिन से ही राजनीति की भेंट चढ़ गई। पहले एनडीए तो बाद में यूपीए सदस्यों की मेहरबानी से यह जांच हमेशा विवादों के घेरे में रही। और आखिर में मामला यहां तक पहुंच गया कि जांच रिपोर्ट की वैधानिकता पर तो सवाल उठ ही रहे हैं, बैठक के दौरान संसदीय मर्यादाएं भी तार-तार हो गईं।

यूं तो यह जांच मुरली मनोहर जोशी से पहले अध्यक्ष बने जसवंत सिंह के कार्यकाल में ही शुरू हो चुकी थी मगर इसे सुर्खियां तब मिली जब सरकार ने इसे जेपीसी के गठन के खिलाफ हथियार बनाया। सरकार के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल और फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद व संसद के बाहर पीएसी की गरिमा का जमकर बखान किया और विपक्ष पर कटाक्ष किया कि क्या भाजपा को अपने ही नेता पर भरोसा नहीं है। मगर तब पूरा विपक्ष, खासतौर पर भाजपा के नेता, जेपीसी की मांग पर अड़े थे।

लिहाजा, उनका तर्क था कि पीएसी इतने बड़े घोटाले के तमाम पहलुओं की पड़ताल नहीं कर सकती क्योंकि उसका दायरा लेखा के मामलों तक सीमित है। उस दौरान जोशी ने बार-बार इस तर्क को काटने का संकेत दिया। साथ ही वह तेजी से जांच की प्रक्रिया भी चलाते रहे। मगर उस वक्त जेपीसी की मांग पर अडिग भाजपा व जदयू के नेताओं ने ही पीएसी की बैठक में गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इन नेताओं ने जांच की गति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब जेपीसी की मांग को लेकर विपक्ष संघर्ष कर रहा है जोशी इतनी मुस्तैदी क्यों दिखा रहे हैं। विवाद इतना बढ़ा कि जोशी को जेपीसी के हक में लिखित बयान जारी करना पड़ा मगर उन्होंने जांच की गति बरकरार रखी।

जब जांच अपने नतीजे के करीब पहुंचने लगी तो सरकारी पक्ष पेंच फंसाने पर आमादा हो गया। लगातार तीन बैठकों में कांग्रेस व उसके समर्थक द्रमुक नेता ने अहम लोगों की गवाही का विरोध किया। कांग्रेस सदस्यों का यहां तक कहना था कि चूंकि जेपीसी गठित हो चुकी है, लिहाजा, पीएसी जांच बंद कर दे। एक बार फिर समिति दो फाड़ हो गई। हालांकि इस बीच कॉर्पोरेट जगत के कई नामचीन हस्तियों की पेशी हुई जैसे अनिल अंबानी और रतन टाटा। साथ ही चर्चित लॉबिस्ट नीरा राडिया की भी पेशी हुई जिसके बारे में रिपोर्ट में तल्ख टिप्पणियां दर्ज की गई हैं।

इसी बीच जेपीसी की पहली बैठक हुई जिसमें पीएसी की जांच पर एतराज किया गया और जेपीसी के प्रमुख पीसी चाको मामला स्पीकर के दरबार लेकर पहुंच गए। हालांकि स्पीकर ने पीएसी की जांच को हरी झंडी दिखाकर जोशी को अपना काम जारी रखने का हौसला दे दिया। कांग्रेस के जबरदस्त विरोध के चलते कैबिनेट सचिव और पीएम के सेक्रेटरी जैसे अहम अफसरों की गवाही नहीं हो पाई। इनसे बाद में लिखित जवाब मांग लिए गए।

कार्यकाल के अंत तक यूपीए सदस्यों का विरोध इतना उग्र हो गया कि अंतिम बैठक में जोशी उठकर चले गए और यूपीए ने सपा, बसपा के सहयोग से रिपोर्ट रोकने में कामयाब न हुई तो उसे खारिज कर डाला। कई सालों से पीएसी में लगातार अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वरिष्ठ नेता ने माना कि दुर्भाग्यवश यह जांच शुरू से ही राजनीति का अखाड़ा बनी रही। जिसके चलते जनता के पैसे की इतनी बड़ी लूट की पड़ताल के बजाय बयानबाजी और विवादों पर लोगों का ध्यान अटका रहा।

Posted on May 1st, 2011
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Posted in :  बड़ी खबर     
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