अपनी अपनी जिंदगी

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फिल्म आयशा में सोनम कपूर के किरदार को कई लोगों ने सराहा तो बहुत लोगों ने भरपूर आलोचना भी की। आयशा पूरी तरह ब्रैंड कांशस, मस्तमौला और अंतरराष्ट्रीय जीवनशैली से प्रभावित लडकी थी। आयशा का किरदार नए दौर के युवा का पूरी तरह प्रतिनिधित्व करता है। वजह है उसकी अंतरराष्ट्रीयता। कपडों का मामला हो या बातों का अंदाज, आयशा के लिए हर मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर आवश्यक था।

अंतरराष्टीयता नए दौर के युवाओं पर पूरी तरह तारी है। बात चाहे कपडों की हो या नौकरी की, उन्हें हर चीज अंतरराष्ट्रीय स्तर की ही चाहिए। शायद यही वजह है कि भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पकड बढती जा रही है। देश की तरक्की में इस ट्रेंड का बडा हाथ है, लेकिन मानने वाले इसे भारतीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर हमले के तौर पर देखते हैं। अंतरराष्ट्रीयता के कुछ पहलुओं पर सखी ने दो पीढियों से बात करके उनकी सोच के फर्क को समझा।

जरूरी है अंतरराष्ट्रीयता?

पिछली पीढी: एक सरकारी बैंक में कार्यरत रमेश शर्मा कहते हैं, अंतरराष्ट्रीयता अपनाना अपनी पहचान खो देने जैसा है। आज के बच्चे अपने देश से ज्यादा विदेशों की संस्कृति से प्रभावित रहते हैं। इसकी शुरुआत अंग्रेजी स्कूलों से होती है, जहां सरस्वती वंदना के बजाय अंग्रेजी प्रार्थनाएं सिखाई जाती हैं। मुझे उन प्रार्थनाओं से शिकायत नहीं है, लेकिन हमारी वंदनाओं की उपेक्षा क्यों?

युवा पीढी: दिल्ली के खालसा कॉलेज की छात्रा साहिबा भाटिया कहती हैं, हां, वैश्वीकरण के इस दौर में अगर खुद को दुनिया के साथ रखना है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खडा होना जरूरी है। आज लगभग हर अच्छा शैक्षिक संस्थान ग्लोबल एक्सचेंज प्रोग्राम चलाता है। इस कार्यक्रम का मकसद ही यही होता है कि एक देश के छात्र दूसरे देश की शिक्षा, संस्कृति और जीवनशैली समझ सकें। इस तरह के कार्यक्रम जाहिर है हमारी पीढी के लोग नहीं आयोजित करते। इनका आयोजन हमारे सीखने के लिए ही होता है। ऐसे में अगर हम सीखा हुआ सबक अपने जीवन में प्रयोग करें तो वह गलत कैसे हुआ!

एक सीख: इसमें कोई दो राय नहीं है कि अंग्रेजी शिक्षण संस्थानों की संस्कृति कई बार देश की संस्कृति से भिन्न दिखाई देती है, लेकिन इसमें किसी पीढी का कोई दोष नहीं है। इस दौर की शुरुआत युवा पीढी ने नहीं की, बल्कि आज की युवा पीढी ने तो उस दौर में ही जन्म लिया। यहां जरूरत है संस्कारों की शिक्षा में संतुलन की। अंतरराष्ट्रीय संस्कारों को सीखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन भारतीय संस्कारों की शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

विदेशी परिधान उचित हैं?

पिछली पीढी: एक निजी कॉलेज में लेक्चचर आकांक्षा राठौर कहती हैं, अंतरराष्ट्रीयता को जीवन में अपनाने का मतलब ये नहीं कि फिरंगियों की तरह एक्सपोजर पर उतर जाया जाए। भारतीय परिधानों को पूरी दुनिया में महत्व दिया जाता है। तो अपने ही देश में इन कपडों की इतनी उपेक्षा क्यों? क्या हमारी युवा पीढी भारतीय परिधानों में युवा नहीं दिखती?

युवा पीढी: जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा अदिति मेहरोत्रा कहती हैं, अगर साडी के साथ कट-स्लीव्स ब्लाउज पहना जाए तो वह शालीन है और जींस के साथ कट-स्लीव्स टी पहन ली जाए तो वह एक्सपोजर हो जाता है! ये मानसिकता गलत है। ज्यादातर लडकियां शालीन तरीके से ही वेस्टर्न कपडे पहनती हैं। अगर कुछ अपवाद हैं भी तो उन्हें अपवाद की तरह ही देखा जाना चाहिए।

एक सीख: भारत में पश्चिमी परिधानों का चलन पुराना है। समय के साथ लोगों ने अपनी जीवनशैली में बदलाव किए हैं और अब वे उनकी जरूरत बन चुके हैं। लेकिन अश्लीलता और शालीनता का फर्क हमारे समाज में अब भी बरकरार है। शालीनता के दायरों में रहकर और मौके के अनुसार अगर परिधानों का चुनाव किया जाए तो पश्चिमी परिधान भी बुरे नहीं है। ग्लोबल होती दुनिया में फैशन का आदान-प्रदान भी अहम भूमिका निभा रहा है।

ब्रेन ड्रेन में बढत?

पिछली पीढी: एक सरकारी बीमा कंपनी की अधिकारी मधु श्रीवास्तव कहती हैं, युवाओं को अब भारतीय कंपनियां रास ही नहीं आतीं। देश में जॉब करने के बजाय वे विदेशों में जाकर या देश में ही स्थापित विदेशी कंपनियों में नौकरी करना बेहतर समझते हैं। इससे बे्रन ड्रेन की समस्या बढती ही जा रही है। भारत के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों से निकले छात्र विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाते हैं, जिससे देश का बहुत नुकसान हो रहा है।

युवा पीढी: एक निजी कंपनी में कार्यरत रमणीक कौर सैनी कहती हैं, भारतीय कंपनियों में काम करने में किसी को परहेज नहीं है बशर्ते वे उस स्तर की हों, जिस स्तर पर विदेशी कंपनियां काम कर रही हैं। विदेशी कंपनियां तरक्की, तनख्वाह और सुविधाओं के मामले में भारतीय कंपनियों से बेहतर होती हैं। हर व्यक्ति को हक है कि वह जीवन में बेहतर चीजों के लिए प्रयास करे। हम वही प्रयास करते हैं। भारत अब मुक्त अर्थव्यवस्था को अपना चुका है। इससे प्रतिस्पर्धा बढी है। अगर भारतीय कंपनियों को बेहतर प्रोफेशनल्स चाहिए तो उन्हें भी बेहतर होना होगा। राष्ट्रीयता के नाम पर लंगडे घोडे की सवारी समझदारी नहीं है। रही बात ब्रेन ड्रेन की तो भारत में इनफोसिस और विप्रो जैसी कंपनियां भी हैं जो सबसे क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स हायर कर रही हैं। ऐसी ही अगर और कंपनियां हों तो हम भी कहां घर से दूर रहना चाहते हैं!

एक सीख : कंपिटीशन का स्तर बढ रहा है। ऐसे में भारतीय कंपनियों को खुद को अपग्रेड करने की जरूरत है। कंपनी चाहे भारतीय हो या विदेशी, अपने कर्मचारियों को बेहतर सुविधाएं देकर साथ जोडे रखना बहुत बडा चैलेंज बनता जा रहा है। बाजार एंप्लॉई-फ्रेंड्ली है, इसलिए हर कंपनी को इस दिशा में काम करने की जरूरत है। युवाओं में आसमान छूने की ख्वाहिश है। अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए वे भरपूर मेहनत करने को भी तैयार हैं।

देशप्रेम में कमी?

पिछली पीढी: एक निजी स्कूल में अध्यापिका सोनाली कपूर कहती हैं, आज की पीढी में देशप्रेम कम ही दिखता है। देशप्रेम का पाठ उन्हें बोरिंग नजर आता है। नए दौर का युवा सारेगामा सीखने के बजाय डोरेमीफा सीखना पसंद करते हैं। अगर इस सोच को न बदला गया तो हमारी संस्कृति की साख को खतरा होगा।

युवा पीढी: पेशे से इंजीनियर सुरुचि खत्री कहती हैं, देशप्रेम की परिभाषा क्या है और इसे कौन तय करेगा? अन्ना हजारे जी ने जब अपील की तो पूरा देश उनके साथ खडा था। उनमें युवा भी शामिल थे। इंटरनेट पर एक पूरा मूवमेंट चल पडा। हम युवाओं ने अपनी तरह से आवाज उठाई। हमें हमारी जिम्मेदारियां पता हैं। हमारा तरीका भले ही अलग हो लेकिन देशप्रेम की कमी नहीं है।

एक सीख : समय बदलता है और साथ ही सोच भी। अपनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार बेहद जरूरी है, लेकिन देशप्रेम का दायरा यहीं तक सीमित नहीं। समय के साथ तरीके बदलते हैं और उन बदले तरीकों को कुबूल करना ही व्यवस्था को चलाता है। यहां भी संतुलन जरूरी है।

दीक्षा पी. गुप्ता

Posted on Jul 18th, 2011
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Posted in :  युवा     
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