शीला का 24 करोड़ के पौधे का भ्रष्टाचार

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नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान राजधानी को हरा-भरा बनाने की कवायद दिल्ली सरकार पर भारी पड़ सकती है। विदेशी खिलाडि़यों एवं मेहमानों को चारों तरफ हरियाली दिखाने की मंशा से दिल्ली सरकार द्वारा गमलों में लगे 60 लाख पौधों की खरीद में जांच एजेंसियों को भारी गड़बड़ी का अंदेशा है।

इन गमलों की खरीद का फैसला मुख्यमंत्री स्तर से खेलों के लिए स्टेडियम बनने से दो साल पहले यानी 2008 में ही ले लिया गया था, लेकिन खेलों के दौरान महंगे दामों पर खरीदे गए ये पौधे पुलिस की सुरक्षा संबंधी शर्तो के चलते स्टेडियमों की शोभा नहीं बन सके।

24 करोड़ रुपये की इस आयातित हरियाली का अब अता-पता नहीं है। सार्वजनिक निर्माण विभाग कह रहा है कि पौधे सरकारी कार्यालयों के हवाले कर दिए गए, लेकिन शुरुआती ऑडिट और सत्यापन में करोड़ों के ये पौधे लापता दर्ज हो रहे हैं।

एजेंसियों को संदेह है कि पौधे खरीदे ही नहीं गए। दिल्ली सरकार ने अगस्त 2008 में जब साठ लाख पौधों की खरीद का निर्णय लिया था तब न तो स्टेडियम तैयार थे और न ही सुरक्षा कार्ययोजना बनी थी। पौधों को खरीदने के लिए मुख्य सचिव के प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने तत्काल मंजूरी दी।

इस तरह दिल्ली को गमले वाले पौधों से हरा-भरा बनाने के लिए 28 करोड़ रुपये का बजट (वास्तविक खर्च 24 करोड़) मंजूर हो गया। गमले में लगे साठ लाख पौधों का पूरा बजट डीडीए, एनडीएमसी, दिल्ली वन विभाग और दिल्ली पार्क एंड गार्डेन सोसाइटी (प्रत्येक दस-दस लाख पौधे) के बीच बंट गया।

पीडब्लूडी और सीपीडब्लूडी के हिस्से में पांच-पांच लाख गमलों का कोटा आया। पड़ताल बताती है कि गमलों की खरीद निर्धारित दरों से बीस फीसदी अधिक कीमत पर हुई। दिल्ली सरकार ने सीधे नर्सरी से गमले खरीद लिए, जबकि दिल्ली की हरियाली का जिम्मा संभालने वाला बागवानी विभाग भी इन्हें तैयार कर सकता था।

इस्तेमाल की बारी आई तो दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था के चलते गमलों को खेल केंद्रों पर लगाने ही नहीं दिया। खेलों के बाद गमलों का गायब होना रहस्य बना हुआ है। पीडब्लूडी के दावों के विपरीत किसी सरकारी विभाग में इन गमलों के इस्तेमाल का कोई ठोस प्रमाण जांच एजेंसियों को नहीं मिला है।

दिल्ली को हरा-भरा बनाने की विवादित कवायद में सरकार के बागवानी विभाग का खेल भी कम नहीं रहा। स्ट्रीट स्केपिंग के तहत इस विभाग ने फुटपाथ पटरियों को सजाने के लिए खजूर, पाम, साइकस रिवोल्यूट, फिकस पांडा और फरकेरिया जैसे महंगे आयातित पौधे लगाए, जिनके लिए यहां की आबोहवा ही माफिक नहीं।

जांच एजेंसियों ने दर्ज किया है कि यह खरीदारी 12 से 400 फीसदी तक ज्यादा कीमत पर हुई। इस तरह 1.10 करोड़ रुपये बेकार खर्च किए गए।

Posted on Jul 29th, 2011
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