टाटा स्काई और बीएसएनएल भी इसरो के साथ

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अरबों रुपये खर्च कर बने उपग्रहों के इस्तेमाल के अधिकार अनोखे  अपारदर्शी ढंग से बेचे जा रहे हैं। तभी तो अनुबंध होने के बाद  टाटा स्काई के लिए ट्रांसपोंडर का किराया घट जाता है और  सरकार को हर साल 4.8 करोड़ रुपये का नुकसान होता है।

भारत संचार निगम तीन साल तक मुफ्त में ट्रांसपोंडर  का इस्तेमाल करता है और सरकार को 229 करोड़ रुपये  का चूना लगता है।

डीआरडीओ और वायुसेना भी मनमाने ढंग से ट्रांसपोंडर लीज का भुगतान बंद कर देते हैं और एंट्रिक्स कॉरपोरेशन कुछ नहीं कर पाता क्योंकि लीज के अनुबंध एकतरफा हैं।

देवास मल्टीमीडिया तो बस एक बानगी है, दरअसल देश के सबसे महंगे और उच्च तकनीक संसाधन (प्रसारण व संचार ट्रांसपोंडर) को लीज पर देने का पूरा कारोबार ही गजब की अनियमितताओं से भरा है और अंतरिक्ष विभाग, इसरो और एंट्रिक्स सवालों के कठघरे में हैं।

उपग्रह अरबों के खर्च से बनने वाले राष्ट्रीय संसाधन हैं और प्रसारण, दूरसंचार का प्रमुख आधार है। अंतरिक्ष विभाग और इसरो की कारोबारी कंपनी एंट्रिक्स की जिम्मेदारी इस संसाधन की सही कीमत वसूलने की ही है।

पिछले ट्रांसपोंडर लीज अनुबंधों की पड़ताल का निष्कर्ष है कि इस कारोबार में सरकार को ही भारी नुकसान और ग्राहकों को भारी फायदा हुआ है।

दैनिक जागरण के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय के मातहत अंतरिक्ष विभाग और इसरो में गहरी अपारदर्शिता की जानकारी सरकार को वर्षो पहले से पता है, क्योंकि कैग की पिछली रिपोर्टो में इस तरफ इशारा किया चुका है। टाटा स्काई का मामला खासा दिलचस्प है। इस डीटीएच प्रसारण कंपनी को 2004 में इनसेट उपग्रह पर बारह हाई पॉवर केयू बैंड ट्रांसपोंडर दिए गए थे।

तत्कालीन अंतरिक्ष सचिव के निर्देश पर एंट्रिक्स कारपोरेशन ने टाटा स्काई (तब स्पेस टीवी) के साथ प्रति वर्ष, प्रति ट्रांसपोंडर पांच करोड़ रुपये के किराये का अनुबंध किया था, लेकिन दीर्घावधि अनुबंध करते वक्त किराया घटाकर 4.6 करोड़ रुपये कर दिया गया।

दिलचस्प है कि टाटा स्काई ने किराया घटाने का अनुरोध भी नहीं किया था। यही नहीं, एंट्रिक्स ने कंपनी को एक माह तक ट्रांसपोंडर के मुफ्त इस्तेमाल की छूट भी दी। इस रहस्यमय उदारता से सरकार को हर साल 4.8 करोड़ का चूना लग रहा है।

सरकारी कंपनी बीएसएनएल इससे भी ज्यादा किस्मत वाली निकली। इसे वीसेट संचार के लिए जुलाई 2003 में कुल 34 ट्रांसपोंडर ( 31 सी बैंड और तीन केयू बैंड) मिले थे, लेकिन एंट्रिक्स लीज की दरें तीन साल बाद मई 2006 में तय कर पाई।

तब तक बीएसएनएल ट्रांसपोंडर का इस्तेमाल करता और उसने बिल चुकाना मई 2006 के बाद से शुरू किया। एंट्रिक्स इतनी बेफिक्र निकली कि उसने बीएसएनएल को तीन साल तक ट्रांसपोंडर इस्तेमाल का बिल भी नहीं भेजा।

इस अपारदर्शी कामकाज से सरकार को 229 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। रक्षा मंत्रालय के मातहत डीआरडीओ ने तो मनमाने ढंग से एंट्रिक्स को लीज का भुगतान बंद कर दिया। वजह, डीआरडीओ की अपनी परियोजना में देरी हो रही थी, जिसके कारण यह एंट्रिक्स से मिली क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। एयरफोर्स मुख्यालय भी इसी नक्शे कदम पर चला। सात करोड़ रुपये की बकायेदारी वाले इन दोनों मामलों में एंट्रिक्स कुछ नहीं कर पाया, क्योंकि अनुबंध में ऐसा होने से रोकने के कोई उपाय ही  नहीं था .

Posted on Feb 15th, 2011
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