अंतरिक्ष विभाग की एकाउंटेंट है “एंट्रिक्स”

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एस बैंड घोटाले में फंसी सरकारी कंपनी एंट्रिक्स कार्पोरेशन उपग्रहों के कारोबारी इस्तेमाल को संभालने के लिए भले ही बनी हो, लेकिन दरअसल यह अंतरिक्ष विभाग की ब्याज कमाऊ कंपनी है। अंतरिक्ष सेवाओं की मार्केटिंग व प्रबंधन तो दूसरी वरीयता पर है। इस कंपनी का आधा मुनाफा सिर्फ ब्याज की कमाई से आता है।

नकदी से अमीर अंतरिक्ष विभाग बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट में एंट्रिक्स के जरिए 800 करोड़ रुपये तक जमा रखता हैं। एंट्रिक्स के वित्तीय खाते इस बात का संकेत हैं कि अंतरिक्ष विभाग के कामकाज और इसे मिलने वाले बजट के इस्तेमाल की प्रक्रिया में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।

एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक कंपनी की नकदी रखने व ब्याज कमाने के लिए यह इस्तेमाल वर्षो से प्रधानमंत्री कार्यालय की नजरों के सामने चल रहा है। हैरत की बात है कि यह कंपनी इस काम में भी बहुत दक्ष नहीं है, क्योंकि कैग सरकार को बता चुका है कि इस कंपनी में एक करोड़ रुपये से 380 करोड़ रुपये तक की नकदी बगैर किसी इस्तेमाल के लंबे समय तक पड़ी रहती है। एंट्रिक्स का गठन अंतरिक्ष विभाग की मार्केटिंग कंपनी के तौर पर किया गया था। मगर मार्केटिंग के मामलों में इस कंपनी ने सरकार को देवास, टाटा स्काई और बीएसएनएल जैसे झटके दिये हैं। सूत्र बताते हैं अंतरिक्ष विभाग को भी इसका ब्याज कमाऊ इस्तेमाल ही सुहाता है। इसलिए कई ट्रासपोंडर लीज के कई बड़े अनुबंध से सौंपे ही नहीं जाते। उन्हें अंतरिक्ष विभाग खुद संभालता है।

एंट्रिक्स का मुनाफा पिछले करीब आठ- नौ वर्षो में 19 करोड़ रुपये से 106 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। लेकिन अधिकाश बढ़ोतरी ब्याज की कमाई से हुई है। कंपनी के पास इस कदर नकदी है कि इसे संभालने के लिए विशेष समिति बनी है जो कितना भी [500 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा भी हटाई जा चुकी है] निवेश करने के लिए अधिकृत है। यह कंपनी एक बैंक में 75 करोड़ रुपये तक रख सकती है। सीएजी ने दो साल पहले सरकार को बताया था कि एंट्रिक्स ने सार्वजनिक बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट में 828 करोड़ रुपये जमा कर रखे हैं।

रही बात कंपनी के मुख्य काम यानी उपग्रह क्षमताओं और सेवाओं की मार्केटिंग की तो उसकी दाल ही काली है। अंतरिक्ष विभाग एंट्रिक्स को कई बड़े देशी व विदेशी वाणिज्यिक अनुबंधों से दूर रखता है। प्रसार भारती यानी दूरदर्शन के साथ 21 इनसेट ट्रासपोंडर के वाणिज्यिक इस्तेमाल का अनुबंध एंट्रिक्स के पास नहीं बल्कि अंतरिक्ष विभाग के पास है। डीटीएच प्रसारण के लिए विदेशी उपग्रहों पर क्षमताएं खरीदने का अनुबंध भी अंतरिक्ष विभाग संभालता है। विदेशी उपग्रह इंटेलसेट को भारती उपग्रह इनसेट पर 11 ट्रासपोंडर लीज पर देने का अनुबंध भी एंट्रिक्स के पास नहीं है।

Posted on Feb 15th, 2011
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Posted in :  बड़ी खबर, भ्रस्टाचार     
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